दल तथा समूह
भारत में अभी तक एक समुचित दल-प्रणाली विकसित नहीं हुई है। एक बड़ी संख्या है में दल निर्वाचनों में भाग लेते हैं। पीछे निर्वाचन आयोग की पंजीकृत दलों की सूची में 565 दल थे। यदि हर तरह से विचार किया जाए तो प्रायः इनकी कोई विशिष्ट विचारधारा नहीं होती या वे किन्हीं कार्यक्रम संबंधी मतभेदों पर आधारित नहीं होते। अनेक दल विशिष्टजनों या जातीय, सांप्रदायिक, जनजातीय, भाषाई या क्षेत्रीय पहचानों के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। ये दल हमेशा बनते रहते हैं, विभाजित होते रहते हैं, एक-दूसरे में विलीन होते रहते हैं, आदि। 1977-79 के दौरान जनता पार्टी और कांग्रेस के साथ और पुनः 1989-90 के दौरान जनता दल और कांग्रेस के साथ थोड़े समय के लिए केवल दो ऐसे अवसर आए थे जब दो-दल प्रणाली सरकार होती हुई नजर आई थी।
1985 तक, संविधान में राजनीतिक दलों का कोई उल्लेख नहीं था। निर्वाचन विधि में प्रतीक आवंटित करने के विशिष्ट प्रयोजन के लिए उन्हें मान्यता देने का उपबंध था। पीठासीन अधिकारियों ने संसद के अपने अपने सदनों के काम-काज की सुविधा के लिए अपने स्वविवेक तथा निदेशों के अधीन संसदीय दलों तथा समूहों को मान्यता दे दी थी। इस प्रकार, लोक सभा में, जिनकी न्यूनतम सदस्य-संख्या गणपूर्ति बनाए रखने के लिए पर्याप्त अर्थात कुल सदस्य संख्या का दसवां भाग थी, उन्हें संसदीय दल के रूप में और जिनकी न्यूनतम सदस्य-संख्या 30 थी, उन्हें संसदीय समूहों के रूप में मान्यता दी जाती थी। संसदीय दल/समूह के रूप में मान्यता मिल जाने के बाद कतिपय कार्यात्मक सुविधाएं उपलब्ध हो जाती थीं। इनमें पृथक स्थानों का आवंटन, दलों के कार्यालयों के लिए पार्लियामेंट एस्टेट में स्थान, संसदीय पत्रों तथा प्रकाशनों की सप्लाई, समितियों में सदस्यता, बोलने के समय का आवंटन, सदन महत्वपूर्ण मामलों में परामर्श आदि शामिल थे।
संविधान (52 वां संशोधन) अधिनियम ने, जिसके अंतर्गत संविधान में दसवी अनुसूची-जिसे आमतौर पर दल-बदल रोक विधि कहा जाता है-जोड़ी गई, पहली बार राजनीतिक दलों तथा विधायी दलों को संवैधानिक मान्यता प्रदान की। इसमें दल की अपनी सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ देता है या उसके निदेशों का पालन नहीं अन्य बातों के साथ साथ यह उपबंध भी है कि यदि कोई सदस्य ऐसे राजनीतिक करता, जिसके टिकट पर वह सदन में चुनकर आया हो, तो वह सदस्यता से निरहित होगा। केवल उन सदस्यों को संरक्षण प्रदान किया गया है जो दल के विभाजन या विलय के बाद ऐसा करते हैं। दल-बदल रोक विधि के प्रवृत्त होने के बाद, सदन का प्रत्येक सदस्य, जो स्वतंत्र या नामनिर्देशित के रूप में नहीं चुना जाता, अपने दल का अंग होता है भले ही वह अपने दल का एकमात्र सदस्य हो अर्थात सदन में प्रतिनिधित्व प्राप्त प्रत्येक दल को, सदन में उसके सदस्यों की संख्या विचार में लाए बिना, स्वतः दल के रूप में संवैधानिक मान्यता प्राप्त हो जाती है। आशा को जानी चाहिए कि इस मामले में संवैधानिक उपबंधों तथा अध्यक्ष के निदेशों के बीच परस्पर विरोध को सुलझाने के लिए शीघ्र ही कार्यवाही शुरू की जाएगी।
बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक नेता :
अमेरिकी कांग्रेस की बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक नेताओं की अवधारणा भारत में लागू नहीं होती। इसके बजाय, हमारे यहां सदन का नेता तथा विपक्ष का नेता होता है।
सदन का नेता :
लोक सभा में बहुसंख्यक दल के नेता को अथवा किसी पार्टी का पूर्ण बहुमत न होने की स्थिति में, ऐसे नेता को, जिसे सदन में बहुसंख्यक सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो, राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री बनने के लिए आमंत्रित किया जाता है। बहुसंख्यक का नेता होने के नाते वह सदन के नेता के रूप में भी कार्य करता है। किसी ऐसी असाधारण स्थिति में, जब प्रधानमंत्री सदन का सदस्य न हो, वरिष्ठतम मंत्री को, जो लोक सभा का सदस्य हो, सदन के नेता के रूप में नामनिर्दिष्ट किया जाता है। इसी तरह, राज्य सभा के सदस्यों में से वरिष्ठतम मंत्री को प्रधानमंत्री द्वारा राज्य सभा में सदन का नेता नियुक्त किया जाता है।
महत्वपूर्ण संसदीय कार्य सदन के नेता के पद के साथ जुड़े हुए हैं। वह अध्यक्ष को सदन का अधिवेशन बुलाने तथा अधिवेशन का अवसान करने की तारीखों का सुझाव देता है, सरकारी कार्य का कार्यक्रम तैयार करता है और परस्पर प्राथमिकताएं निश्चित करता है।
सदन का नेता सदन की गुप्त बैठक का सुझाव दे सकता है। अध्यक्ष सरकारी कार्य की व्यवस्था, महत्वपूर्ण चर्चाओं के लिए समय के आवंटन, किसी सदस्य के निलंबन, विशेषाधिकार प्रस्तावों आदि के संबंध में उसके साथ सीधे या संसदीय कार्य मंत्री के माध्यम से परामर्श करता है। सदन का नेता समूचे सदन के प्रति जिम्मेदार तथा प्रत्युत्तरदायी होता है। अनेक महत्वपूर्ण अवसरों पर वह समूचे सदन के लिए तथा उसकी ओर से बोलता है। वह दोनों सदनों के लिए उप-नेता का नामनिर्देशित कर सकता है।
विपक्ष का नेता :
प्रत्येक सदन में विपक्ष के सबसे बड़े दल के नेता को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी जाती है किंतु उस दल के सदस्यों की संख्या इतनी होनी चाहिए जो सदन की कार्यवाही को चलता रख सके अर्थात संख्या सदन की बैठक के लिए नियत गणपूर्ति से, जो कुल सदस्य-संख्या का दसवां भाग है, कम नहीं होनी चाहिए।
चूंकि ब्रिटिश टाइप की दो-दल प्रणाली अभी तक भारत में विकसित नहीं हुई है, इसलिए विपक्ष का नेता अपने स्वयं के छाया मंत्रिमंडल के साथ प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री नहीं हो सकता। वस्तुतया ऐसी स्थिति आ सकती है जब विपक्ष के नेता सत्तारूढ़ दल की अपेक्षा एक-दूसरे के अधिक विरुद्ध हों।
'आधिकारिक' विपक्ष तथा विपक्ष के नेता को स्वाधीनता के बाद पहली बार दिसंबर, 1969 से दिसंबर, 1970 के दौरान मान्यता दी गई थी जब कांग्रेस पार्टी कांग्रेस (आर) तथा कांग्रेस (ओ) में विभाजित हो गई थी; पहली सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी तथा दूसरी विपक्ष में थी, जिसका नेता विपक्ष का नेता था। 1977 में छठे सामान्य निर्वाचनों के बाद, जिसके परिणामस्वरूप जनता पार्टी की सरकार बनी, कांग्रेस पार्टी मान्यताप्राप्त आधिकारिक विपक्ष बन गई और इसका नेता 1977-79 के दौरान विपक्ष का नेता रहा। एक बार फिर, दिसंबर, 1989-दिसंबर, 1990 के दौरान श्री राजीव गांधी लोक सभा में विपक्ष के नेता थे। तत्पश्चात 1991 से 1994 तक भारतीय जनता पार्टी आधिकारिक विपक्ष रही और दोनों सदनों में इसका नेता विपक्ष का नेता रहा।
1977 से लोक सभा तथा राज्य सभा में विपक्ष के नेताओं को कतिपय आधिकारिक पदस्थिति तथा केबिनेट मंत्री के बराबर वेतन, संसद भवन में कार्यालय की सुविधाएं आदि जैसी सुविधाएं दी जाती हैं। वेतन तथा भत्ते संसद में विपक्षी नेता वेतन और भत्ता अधिनियम, 1977 द्वारा विनियमित होते हैं।
1977 के अधिनियम में विपक्ष के नेता की परिभाषा राज्य सभा/लोक सभा के ऐसे सदस्य के रूप में दी गई है, जो तत्समय, सरकार की विपक्षी ऐसी पार्टी का नेता है, जिसके सदस्यों की संख्या सबसे अधिक हो तथा उसे राज्य सभा लोक सभा के सभापति/अध्यक्ष द्वारा इस रूप में मान्यता दी गई है।
सचेतक तथा दलीय अनुशासन :
भारतीय संसदीय संदर्भ में, संसदीय दल या समूह का सचेतक वह होता है जिसे यह सुनिश्चित करने के लिए नामनिर्दिष्ट किया गया हो कि दल के सदस्य महत्वपूर्ण प्रश्नों के समय पर्याप्त संख्या में उपस्थित हों तथा दल द्वारा निर्धारित आदेशों के अनुसार मतदान करें। लोक सभा/राज्य सभा में सरकारी दस का मुख्य सचेतक संसदीय कार्य मंत्री होता है तथा वह प्रत्यक्षतया सदन के नेता के प्रति उत्तरदायी होता है। संसदीय कार्यों के संबंध में सवार को परामर्श देना उसके कर्तव्यों का एक अंग है। जहां तक सदस्यों का संबंध सचेतक दल के नेता के आंख तथा कान का काम करता है। अधिवेशनों के देगर, नेता के सलाहकार की अपनी हैसियत में, उसे प्रधानमंत्री के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखना होता है। दो राज्य मंत्री मुख्य सचेतक की सहायता करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्थान पर रखने तथा अपने दल को एकजुट, मजबूत और सुसंगठित बना रखने की जिम्मेदारी उसकी होती है।
सत्तारूढ़ दल तथा विपक्षी दलों के सचेतक सर्वसामान्य हित के मामलों को सुलझाने तथा अनेक नाजुक मौकों पर एक-दूसरे को समझने तथा समझाने के लिए एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं। इस प्रकार, सत्तारूढ़ दल के एवं विपक्षी दलों के सचेतक संसदीय लोकतंत्र के सुप्रवाही तथा कुशल कार्यकरण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सरकारी दल के सचेतक को 'सदन को एकत्र करना तथा उसे बनाए रखना होता है। इसका अर्थ यह है कि इस बात को सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी उसकी होती है कि जब तक सदन की बैठक चलती है, उसमें गणपूर्ति बनी रहे और सदस्यगण, विशेष रूप से जब कोई महत्वपूर्ण कार्य विचाराधीन हो, इतनी दूरी के अंदर-अंदर उपस्थित रहें जहां मत-विभाजन की घंटियों की आवाज सुनाई देती हो। उसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण काम सदस्यों की उपस्थिति को सुनिश्चित करना और खासतौर पर महत्वपूर्ण वाद विषयों के संबंध में अपने दल की शक्तियों को सुविन्यस्त करना होता है।
सदन का प्रबंधक होने के नाते, सत्तारूढ़ दल का मुख्य सचेतक अन्य दलों के सचेतकों के परामर्श से मतभेदों को शांत करने तथा सदन के कार्य की योजना बनाने का काम कराता है। वह एक ओर संसद के दोनों सदनों, उनके पीठासीन अधिकारियों और सचिवों तथा दूसरी ओर मंत्रियों तथा मंत्रालयों और सरकार के विभागों के बीच संपर्क का कार्य करता है। संक्षेप में, इस समय सचेतकों के कार्यों में प्रबंध, संचार और समझाने-बुझाने के कार्य सम्मिलित हैं। वे अपने सदस्यों को सदन के कार्य तथा विभिन्न वाद विषयों पर दल की विचारधारा से अवगत कराते रहते हैं तथा दल में अनुशासन लागू करते हैं।
अधिवेशनों के दौरान, विभिन्न दलों के सचेतक अपने सदस्यों को समय समय पर सूचनाएं तथा निदेश भेजते रहते हैं जिनमें उन्हें महत्वपूर्ण वाद-विवादों तथा मत-विभाजनों की सूचना दी गई होती है, उन्हें बताया गया होता है कि किस समय पर मत-विभाजन होने की संभावना है और उस समय पर उनकी उपस्थिति की अपेक्षा की गई होती है। ऐसी सूचनाओं अथवा निदेशों को भी सचेतक' कहा जाता है।
सचेतक तीन प्रकार के होते हैं-एक पंक्ति के, दो पंक्ति के और न पक्ति के सचेतका उन्हें यह नाम उनकी उन पंक्तियों की संख्या के अनुसार दिया जाता है जिनके द्वारा उनके पाठ को रेखांकित किया जाता है। पक्तियों की संख्या इस बात की घोतक होती है कि सदन के समक्ष उपस्थित कानून विशेष कितना महत्वपूर्ण है तथा उसकी कितनी अपरिहार्यता है। तीन पंक्ति का सचेतक अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य तथा मत-विभाजन का संकेतक होता है। सदस्य को इसका अवश्य पालन करना चाहिए तथा सदन में उपस्थित होना चाहिए; यह पूर्णतया आज्ञापक होता है तथा इसकी अवहेलना केवल अपने आपको खतरे में डालकर ही की जा सकती है। तीन पक्ति के सचेतक की उपेक्षा करना निश्चित रूप से गंभीर अनुशासनिक कार्यवाही न्यौता देना है।
ब्रिटिश लेबर तथा कंजर्वेटिव पार्लियामेंटरी पार्टी द्वारा जारी किए गए सचेतकों में प्रयोग में लाई गई भाषा और भारत में कांग्रेस (आई) संसदीय दल द्वारा जारी किए गए सचेतकों की भाषा में अंतर है। इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय अंतर यह है कि जबकि ब्रिटिश सचेतक केवल उपस्थित रहने का अनुरोध' या विशेष रूप से अनुरोध' करते हैं या उपस्थिति को अनिवार्य घोषित करते हैं, भारतीय सचेतक इससे भी आगे बढ़ जाते हैं तथा सदस्यों को न केवल उपस्थित रहने के लिए कहते हैं बल्कि उन्हें निदेश देते हैं कि वे सरकारी नीति का समर्थन करें या सचेतक द्वारा बताए गए ढंग से, 'निश्चित रूप से दल के प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करें। ब्रिटिश सचेतक कभी भी समर्थन' या 'मतदान' की बात नहीं करते बल्कि 'उपस्थिति तक सीमित होते हैं।
भारत के संविधान या सदन के प्रक्रिया संबंधी नियमों में सचेतक के पद का कोई उल्लेख नहीं है। वस्तुतया, अभी हाल तक राजनीतिक दलों या मान्यता के बारे में भी इस तरह का कोई उल्लेख नहीं मिलता था। संविधान (52वां संशोधन) अधिनियम, 1985, जिसे आमतौर पर दल-बदल रोक कानून कहा जाता है, पारित होने के साथ ही दल के अनुशासन को बनाए रखने के मामले में सचेतक की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि सचेतक दल का एक निदेश है तथा दल के निदेश की अवहेलना करने पर अब. सदस्यता से हाथ धोना पड़ सकता है।
दल-बदल रोक कानून
संविधान (52वां संशोधन) अधिनियम, 1985 के द्वारा स्थानों के रिक्त होने तथा संसद तथा राज्य विधानमंडलों की सदस्यता से निरर्हता के संबंध में सविधान के अनुच्छेद 101, 102, 190 और 191 में संशोधन कर दिया गया तथा सोवधान में एक नई अनुसूची (दसवीं अनुसूची) जोड़ दी गई, जिसमें दल-बदल के आधार पर निरर्हता के लिए कतिपय उपबंधों का उपवर्णन किया गया। दसवीं अनुसूची में अन्य बातों के साथ साथ यह उपबंध है कि :
(i) संसद या राज्य विधानमंडल का कोई सदस्य को किसी राजनीतिक दल द्वारा खड़े किए गए अभ्यर्थी के रूप सदस्य निर्वाचित हुआ है, तथा संसद या राज्य विधानमंडल का कोई नामनिर्देशित सदस्य, जो अपना स्थान ग्रहण करने के समय किसी राजनीतिक दल का सदस्य हो, दल-बदल के आधार पर निरहित होगा यदि उसने ऐसे राजनीतिक दल की अपनी सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ दी या ऐसे दल द्वारा दिए गए किसी निदेश के विरुद्ध मतदान किया हो या मतदान करने से विरत रहा है ।
(ii) संसद या राज्य विधानमंडल का कोई सदस्य निरहित होगा यदि वह अपने निर्वाचन के बाद किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जाता है।
(iii) संसद या राज्य विधानमंडल का कोई नामनिर्देशित सदस्य, जो उसके नामनिर्देशन के समय किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं है तथा जो अपना स्थान ग्रहण करने की तारीख से छह मास की समाप्ति से पूर्व किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं बन गया है, निरहित होगा यदि वह छह मास की उक्त अवधि की समाप्ति के बाद किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित होता है।
(iv) जहां कोई सदस्य दावा करता है कि वह किसी दल के विभाजन से या किसी दल के दूसरे दल में विलय से उत्पन्न गुट का प्रतिनिधित्व करने वाते समूह से संबद्ध है तो उस स्थिति में कोई निरर्हता नहीं होगी किंतु विभाजन की स्थिति में विधान दल के दो-तिहाई से अन्यून सदस्य उस समूह में होने चाहिए।
(v) कोई व्यक्ति, जो लोक सभा अथवा किसी राज्य की विधान सभा के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के पद पर अथवा राज्य सभा के उपसभापति या किसी राज्य की विधान परिषद के सभापति या उपसभापति के पद पर निर्वाचित हुआ है, यादे वह अपने राजनीतिक दल से संबंध विच्छेद कर लेता है तो वह निरहित नहीं होगा;
(vi) यदि यह प्रश्न उठता है कि संसद या राज्य विधानमंडल के किसी सदन का कोई सदस्य निरर्हता से ग्रस्त हो गया है या नहीं तो उसका विनिश्चय उस सदन के सभापति या अध्यक्ष द्वारा किया जाएगा, जहां प्रश्न स्वयं सभापति या अध्यक्ष के संदर्भ में हो तो उसका विनिश्चय संबंधित सदन के उस सदस्य द्वारा किया जाएगा, जिसे इस निमित्त निर्वाचित किया गया हो;
(vii) इस अनुसूची के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए सदन के सभापति या अध्यक्ष को नियम बनाने की शक्ति प्रदान की गई है। नियम सदन के सामने रखे जाने अपेक्षित हैं और सदन द्वारा उनमें परिवर्तन किए जा सकते हैं। उनका निरनुमोदन किया जा सकता है;
(viii) इस अनुसूची के अधीन सदन के किसी सदस्य की निरर्हता के बारे में किसी प्रश्न के संबंध में सभी कार्यवाहियों के बारे में यह समझा जाएगा कि वे यथास्थिति, अनुच्छेद 122 के अर्थ में संसद की कार्यवाहियां हैं या अनुच्छेद 212 के अर्थ में राज्य के विधानमंडल की कार्यवाहियां हैं; और
(ix) संविधान में किसी बात के होते हुए भी, किसी न्यायालय को सदन के किसी सदस्य की निरर्हता से संबंधित किसी विषय के बारे में कोई अधिकारिता नहीं होगी।
दसवीं अनुसूची के उस पैरा को, जिसके अंतर्गत न्यायालयों की अधिकारिता का वर्णन किया गया है, पंजाब तथा हरियाणा उच्च न्यायालय ने संविधान के अधिकार से परे होने के कारण विखंडित कर दिया था। इस आदेश के विरुद्ध सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की गई। उच्चतम न्यायालय ने (किहोटो होलोहान बनाम ज़ाचिल्लहू तथा अन्य, एस सी, 1991 का सी डब्ल्यू पी 17) पाया कि दल-बदल रोक कानून के इस पैरे में वैधिक शैथिल्य है क्योंकि संविधान संशोधन विधेयक का, उसे राष्ट्रपति की अनुमति के लिए प्रस्तुत किए जाने से पूर्व, अपेक्षित संख्या में राज्यों की विधान सभाओं द्वारा अनुसमर्थन नहीं किया गया। इसके अलावा, दसवीं अनुसूची के अधीन अध्यक्ष के कृत्य विषयों का विधि के अधीन न्यायिक अवधारणा किए जाने की मांग करते हैं। निरर्हता के प्रश्न का अवधारण करने की प्रक्रिया को सदन की कार्यवाही का हिस्सा नहीं माना जा सकता और इसलिए वह न्यायिक पुनर्विलोकन से बरी नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने न्यायालयों की अधिकारिता का वर्जन करने वाले अनुसूची के पैरा 7 का विखंडन कर दिया तथा घोषणा की कि दल-बदल रोक कानून के अधीन कार्य करते हुए अध्यक्ष एक अधिकरण की स्थिति में होता है और इसलिए उसके विनिश्चय सभी अधिकरणों की भांति न्यायिक पुनर्विलोकन के अध्यधीन हैं।
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