Friday, March 18, 2022

अंतर्संसदीय संपर्क क्या है What is Interparliamentary Contact

अन्य क्षेत्रों की तरह संसदीय क्षेत्र में भी विधायी संस्थाओं में काम करने वालों द्वारा विचारों का आदान-प्रदान और अपने अपने अनुभव एक-दूसरे को बताने की स्पष्ट उपयोगिता एवं महत्व होता है। इस तथ्य की दृष्टि से, भारतीय संसद ने देश के भीतर और विश्व के अन्य भागों के विधानमंडलों के साथ, विभिन्न साधनों के द्वारा, निकट के संपर्क विकसित करने और बराबर बनाए रखने का प्रयास किया है। 


संसद तथा राज्य विधानमंडल 


संविधान के अधीन, संसद के और राज्य विधानमंडलों के प्रत्येक सदन को अपनी अपनी प्रक्रिया तथा अपने अपने कार्य संचालन को सुनियोजित करने के लिए नियम बनाने की शक्ति प्राप्त है। संसद और राज्य विधानमंडलों के सदनों ने अपनी-अपनी स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार कुछ परिवर्तनों के साथ, अपने कार्य के संचालन के लिए प्रक्रिया के समरूपी नियम बनाए हैं। प्रक्रिया में यह समरूपता उन निकट के संपर्कों का परिणाम है जो संसद और राज्य विधानमंडलों ने सम्मेलनों, विचारगोष्ठियों, संगोष्ठियों, पत्र-व्यवहार, चर्चाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों, प्रबोधन पाठ्यक्रमों आदि के माध्यम से आपस में स्थापित किए हैं और बनाए रखे हैं। पीठासीन अधिकारियों, विधायी निकायों के सचिवों और संसदीय समितियों के सभापतियों द्वारा समय समय पर सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं। इसी प्रकार, संसदीय प्रथा तथा प्रक्रिया और संसदीय तथा विधायी संस्थाओं की सर्वोच्चता की दृष्टि से, चयनित महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-गोष्टियां एवं संगोष्ठियां, समय समय पर, संघ के स्तर पर और राज्यों के स्तर पर आयोजित की जाती हैं। पीठासीन अधिकारी, प्रसिद्ध सांसद, राज्य विधानमंडलों के सदस्य, विशिष्ट विधिवेत्ता, वरिष्ठ संसदीय अधिकारी एवं विशेषज्ञ उन्हें संबोधित करते हैं। 


पीठासीन अधिकारियों तथा विधायी निकायों के सचिवों और संसदीय समितियों सभापतियों के सम्मेलनों में यापि सामान्यतया कोई संकल्प स्वीकत नहीं किए नाले, फिर भी संसदीय विधायी प्रथा और प्रक्रिया तथा साझी याजस्तविक रूपमा उरिल प्रश्नों पर, मतैक्य लाने में उसकी चर्चाएं बहुत उपयोगी सिद्ध होती है। 


भारत के विधायी निकायों के पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन : 


भारत में शायी निकायों के पीठासीन अधिकारियों का प्रथम सम्मेलन 14 सितंबर, 1971 को दिल्ली में हुआ था, जिसकी अध्यक्षता अध्यक्ष व्हाइट ने की थी। पिकने कुछ से यह सम्मेलन, बारी बारी, अलग अलग राज्यों की राजधानियों में, प्रतिवर्ष दो या तीन दिन के लिए होता है। यह एक महत्त्वपूर्ण मंच होता है जहां अनुभवों का आदान-प्रदान हो सकता है और प्रक्रियागत समस्याओं पर पूरी चर्चा हो सकती है। इससे स्वस्थ संसदीय प्रधाएं और परंपराएं विकसित करने और संसद में और राज्य विधानमंडलों में यथासंभव समरूपी प्रथा एवं प्रक्रिया स्थापित करने में सहायता मिलती है। 


लोक सभा का अध्यक्ष पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन का पदेन सभापति होता है और लोक सभा का महासचिव सम्मेलन के सचिव के रूप में कार्य करता है। 


भारत में विधायी निकायों के सचिवों का सम्मेलन : 


भारत में विधायी निकायों के सचिवों का प्रथम सम्मेलन 1943 में हुआ था और से यह लगभग प्रत्येक वर्ष प्रायः पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन से एक दिन पूर्व होता है। इस सम्मेलन का उद्देश्य सारे भारत में विधानमंडल सचिवालयों के समक्ष आने वाली प्रशासनिक, प्रक्रियागत और अन्य साझी समस्याओं पर विचार करना, और पोगसीन अधिकारियों के सम्मेलन द्वारा इसे निर्दिष्ट किसी मामले पर विचार करना और प्रतिवेदन देना है। 


संसदीय समितियों के सभापति का सम्मेलन :


संसदीय समितियों, अर्थात, लोक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति, सरकारी उपक्रमों संबंधी समिति, अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के कल्याण संबंधी समिति, सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति, अधीनस्थ विधान संबंधी समिति इत्यादि समितियों के सभापतियों के सम्मेलन सामयिक रूप से होते हैं। ये सम्मेलन इन समितियों से संबधित परस्पर हित के प्रश्नों पर विचार करने के लिए, समान नीति विकसित करने के लिए प्रथा एवं प्रक्रिया के महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचारों के आदान-प्रदान के लिए होते हैं। ये सम्मेलन नई दिल्ली में (संसद भवन में या संसदीय सौध में) संबंधित संसदीय समिति के सभापति की अध्यक्षता में, लोक सभा की कार्यावधि में आमतौर पर एक बार होते हैं। 


संसदीय तथा राज्य विधानमंडलों की समितियों के दौरे : 


राज्य विधानमंडलों की समितियां प्रायः नई दिल्ली और विभिन्न राज्यों की राजधानी के दौरे करती हैं और समान हित के मामलों पर विचारों के आदान-प्रदान के लिए संसद की अपनी बनकक्ष समितियों से और राज्य विधानमंडलों की अपनी समकक्ष समितियों से मिलती हैं। दौरे पर आई समितियां विधानमंडल की समितियों की, जब वे साक्ष्य लेती हैं, कार्यवाहियां भी देखती हैं। संसदीय समितियां अपने विषयों का मौके पर अध्ययन करने के लिए जब राज्यों के दौरे पर जाती हैं तो उस समय राज्यों में अपनी समकक्ष समितियों से भी मिलती हैं। 


विचार-गोष्ठियां संगोष्ठियां : 


विचार-गोष्ठियां और संगोष्ठियां नई दिल्ली में भारतीय संसदीय ग्रुप के और संसदीय अध्ययन तथा प्रशिक्षण केंद्र के तत्वावधान में समकालीन महत्व के विषयों पर होती हैं जिनमें संसद के और राज्य विधानमंडलों के सदस्य भाग लेते हैं। विभिन्न राज्यों में समय समय पर विचार-गोष्ठियां आयोजित होती रहती हैं। पिछले कुछ वर्षों से किसी सामयिक रुचि के विषय पर पीठासीन अधिकारियों के वार्षिक सम्मेलन के अंतिम दिन भी एक विचार-गोष्ठी आयोजित की जाती है। 


भारतीय संसदीय ग्रुप : 


1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तो अंतर्संसदीय संघ और राष्ट्रमंडल संसदीय संघ जैसे अंतर्राष्ट्रीय निकायों द्वारा तुरंत अनुरोध किए गए कि भारत उनका सदस्य बने और भारतीय शाखाएं खोले। ऐसे अनुरोध किए जाने पर भारतीय संसदीय ग्रुप' नामक एक स्वायत्त निकाय स्थापित किया गया। संसद के सदस्य उस निकाय के सदस्य बन सकते हैं। भूतपूर्व संसद सदस्य इसके सह सदस्य बन सकते हैं। अध्यक्ष, लोक सभा इसके पदेन प्रेजीडेंट हैं और उपाध्यक्ष, लोक सभा तथा उपसभापति, राज्य सभा, इसके वाइस प्रेजीडेंट हैं। महासचिव लोक सभा भारतीय संसदीय ग्रुप के पदेन सचिव हैं। 


यह ग्रुप अंतर्संसदीय संघ के राष्ट्रीय ग्रुप के रूप में और राष्ट्रमंडल संसदीय संघ की भारत शाखा के रूप में कार्य करता है। 


अंतसंसदीय संबंध 


लोगों के प्रतिनिधियों के रूप में सांसदों की, अंतर्राष्ट्रीय तनाव कम करने और देशों के बीच समझ-बूझ को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है क्योंकि वे लोकमत का निर्माण कर सकते हैं और लोगों और देशों में समझ-बूझ पैदा करने के लिए अपने अपने देशों की कार्यपालिका पर प्रभाव डाल सकते हैं और विश्व शांति एवं सहयोग को बढ़ावा दे सकते हैं। भारत की संसद विदेशों की संसदों के साथ प्रतिनिधिमंडलों, सद्भावना मिशनों आदि का आदान-प्रदान करती है और भारतीय संसदीय ग्रुप के माध्यम से अंतसंसदीय संघ और राष्ट्रमंडल संसदीय संघ के तत्वावधान में आयोजित सम्मेलनों में नियमित रूप से भाग लेती है। 


अंतर्संसदीय संघ राष्ट्रीय संसदों में गठित संसदीय ग्रुपों का संघ है जिसका उद्देश्य सभी संसदों के सदस्यों में वैयक्तिक संपर्क को बढ़ावा देना और साझी कार्यवाही के लिए उन्हें एकजुट करना है ताकि संसदीय संस्थाएं स्थापित करने और उनका विकास करने के कार्य में उनके अपने अपने राज्य भाग ले सकें और संयुक्त संघ के उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक हो सकें। इस संघ का सम्मेलन वर्ष में दो बार होता है और सदस्य देश मेजबान होते हैं। 


राष्ट्रमंडल संसदीय संघ राष्ट्रमंडल के सांसदों का संघ है जिसका उद्देश्य आपस में समझ-बूझ और सहयोग को बढ़ावा देना और संसदीय संस्थाओं के अध्ययन को और उनके प्रति सम्मान को बढ़ावा देना है। इस संघ का प्रत्येक वर्ष सम्मेलन होता है और यह प्रादेशिक स्तरों पर संसदीय प्रथा एवं प्रक्रिया पर विचार-गोष्ठियां आयोजित करने में भी सहायक होता है। 


भारत जब से अंतर्संसदीय संघ और राष्ट्रमंडल संसदीय दल का सदस्य बना है तभी से इन संस्थाओं के कार्यकरण में पर्याप्त रुचि लेता है। भारत 1969 में ठावें अंतसंसदीय संघ के सम्मेलन का मेजबान था; 1957 और 1975 में राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलनों का भी मेजबान था और 1969 और 1986 में राष्ट्रमंडल अध्यक्षों तथा पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलनों का भी मेजबान था। इसके अतिरिक्त, अनेक अंतर्राष्ट्रीय प्रादेशिक विचार-गोष्ठियों का समय समय पर भारत में आयोजन किया जाता रहा है। सितंबर, 1991 में एक बार फिर भारत ने राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलन की और 1993 में अंतर्संसदीय सम्मेलन की मेजबानी की और नई दिल्ली में यह सम्मेलन विधिवत संपन्न हुआ |


जनवरी, 1994 में छटो राष्ट्रमंडल संसदीय गोष्ठी नई दिल्ली में आयोजित हुई। जुलाई, 1995 में सार्क देशों की संसदों के अध्यक्षों का प्रथम सम्मेलन भी नई दिल्ली में संपन्न हुआ। “राजनीति में पुरुषों और महिलाओं के बीच भागीदारी" विषय पर अंतर-संसदीय विशेषीकृत सम्मेलन संयुक्त रूप से भारतीय संसदीय समूह (आई.पी. जी.) और अंतर्संसदीय संघ (आई.पी.यू.) के तत्वावधान में फरवरी, 1997 में नई दिल्ली में हुआ। सार्क संसदों में लोक लेखा समितियों के सभापतियों का प्रथम सम्मेलन भी नई दिल्ली में अगस्त, 1997 में हुआ। 2003 के प्रारंभ में (जनवरी में) भारतीय संसद की स्वर्ण जयंती के अवसर पर एक अंतर्राष्ट्रीय संसदीय सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें लगभग 80 राष्ट्रों की संसदों के अध्यक्षों प्रतिनिधियों ने भाग लिया 

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