Thursday, March 17, 2022

संसदीय विशेषाधिकार क्या है What is Parliamentary Privilege

'विशेषाधिकार' का अर्थ है व्यक्तियों के किसी वर्ग विशेष को या कुछ व्यक्तियों को प्राप्त कोई अधिकार या स्वतंत्रता या कोई उन्मुक्ति जो शेष लोगों को प्राप्त न हो। विधि के रूप में इसका अर्थ है सभी लोगों पर लागू होने वाले किसी शुल्क, भार, हाजिरी या दायित्व से छूट। विशेषाधिकार की परिभाषा इस तरह की जा सकती है कि यह एक ऐसा अधिकार है जो अन्य लोगों को प्राप्त नहीं है। 


संसदीय विशेषाधिकार संसद के विशेषाधिकार नहीं हैं क्योंकि संसद तो राष्ट्रपति और दोनों सदनों से बनती है जबकि संसदीय विशेषाधिकार केवल सदनों को, उनकी समितियों को और उनके सदस्यों को ही प्राप्त हैं। संसदीय विशेषाधिकार वे विशिष्ट अधिकार हैं जो संसद के दोनों सदनों को, उसके सदस्यों को और समितियों को प्राप्त हैं और जिनके बिना वे अपने कृत्यों का यथोचित और निर्बाध निर्वहन नहीं कर सकते। विशेषाधिकार इस दृष्टि से दिए जाते हैं कि संसद के दोनों सदन, उनकी समितियां और सदस्य स्वतंत्र रूप से काम कर सकें। व्यवहार में, विशेषाधिकारों से कुछ शक्तियां और उन्मुक्तियां मिलती हैं। परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि कानून की नजरों में साधारण नागरिकों के मुकाबले में विशेषाधिकार प्राप्त सदस्यों की स्थिति भिन्न होती है जब तक कि स्वयं संसद के हित में ऐसी भिन्न स्थिति होने के उपयुक्त कारण न हों। जहां तक विधियों के लागू होने का संबंध है, सदस्य लोगों के प्रतिनिधि होने के साथ साथ साधारण नागरिक भी होते हैं। मूल विधि यह है कि संसद सदस्यों सहित सभी नागरिक कानून की नजरों में बराबर माने जाने चाहिए। संसद सदस्यों को साधारण नागरिकों की तरह अधिकार और स्वतंत्रताएं प्राप्त हैं। सिवाय उस स्थिति के जवकि वे संसद में अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं। सदस्यों को केवल उसी समय और उसी सीमा तक विशेषाधिकार उपलब्ध हैं जिस समय और जिस सीमा तक वे संसद के लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं और अपने संसदीय उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर रहे होते हैं। सदस्यों के विशेषाधिकारों के कारण उन्हें समाज के  प्रति अपने साधारण दायित्वों से किसी भी प्रकार की छूट नहीं मिलती। जो दायित्व नागरिकों के हैं वही उनके भी होते हैं और शायद सदस्य होने के नाते कुछ अन्य अधिक होते है  


इस प्रकार, किसी सदस्य को किसी प्रकार की आक्रामक अथवा परेशान किए जाने की कार्यवाही के विरुद्ध विशेषाधिकार तभी उपलब्ध होता है जबकि संसद सदस्य रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय उसके लिए कोई बाधा उपस्थित की जाए या किसी प्रकार उसको परेशान किया जाए। ऐसे मामलों में जबकि सदस्य किसी संसदीय कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर रहे थे और उस समय पर उन पर आक्रमण किया गया, यह निर्णय दिया गया कि विशेषाधिकार भंग नहीं हुआ या सदन की अवमानना नहीं हुई। इसी प्रकार, यदि किसी संसद सदस्य के किए गए अपमान उस पर लगाए गए आक्षेप का सदन के सदस्य के रूप में उसके आचरण या चरित्र से संबंध नहीं है तो संसद के विशेषाधिकार का मामला नहीं बनता। इसके अतिरिक्त, किसी सदस्य को देश की साधारण विधियों के प्रवर्तन से छूट नहीं होती और एक विशिष्ट मामले में यह निर्णय दिया गया है कि किसी सदस्य को, सभी 'नागरिकों पर समान रूप से लागू होने वाली विधि द्वारा प्राधिकृत रूप से डाक को सेंसर करने और टेलीफोन पर होने वाली बातों को बीच में सुनने के बारे में कोई विशिष्ट विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है। 


सदैधानिक उपबंध : 


अधिक महत्वपूर्ण संसदीय विशेषाधिकार संविधान के अनुच्छेद 105 में उल्लिखित हैं। इनमें प्रमुख हैं संसद में वाक्-स्वातंत्र्य और संसद के किसी सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जा सकने के अधिकार। रा-गों के बारे में ऐसा उपबंध अनुच्छेद 194 में किया गया है। उनमें से कुछ विशेषाधिकार कतिपय संविधियों में और लोक सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन संबंधी नियमों में उल्लिखित हैं और कुछ अन्य इस देश में विकसित प्रथाओं पर और पूर्वधारणाओं पर आधारित हैं। 


संविधान के अनुच्छेद 105 में यह उपबंध है : 


(1) इस संविधान के उपबंधों के और संसद की प्रक्रिया का विनियमन करने वाले नियमों और स्थायी आदेशों के अधीन रहते हुए, संसद में वाक् स्वातंत्र्य होगा। 

(2) संसद में या उसकी किसी समिति में संसद के किसी सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी और इसी प्रकार संसद के किसी सदन के प्राधिकार द्वारा या उसके अधीन किसी रिपोर्ट, पत्र, मतों या कार्यवाहियों के प्रकाशन के संबंध में किसी न्यायालय में कार्यवाही से उन्मुक्ति होगी। 

(3) अन्य बातों में संसद के प्रत्येक सदन और प्रत्येक सदन के सदस्यों और समितियों की शक्तियां, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां ऐसी होंगी जो संसद, समय समय पर, विधि द्वारा परिनिश्चित करे और जब तक वे इस प्रकार परिनिश्चित नहीं की जाती हैं तब तक वही होंगी जो संविधान (चवालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा-15 के प्रवृत्त होने से ठीक पहले उस सदन की और उसके सदस्यों और समितियों की थीं। 

(4) जिन व्यक्तियों को इस संविधान के आधार पर संसद के किसी सदन या उसके किसी समिति में बोलने का और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग लेने का अधिकार है, उनके संबंध में खंड (1), खंड (2) और खंड (3) के उपबंध उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे संसद के सदस्यों के संबंध में लागू होते हैं। 


आरंभ में अधिनियमित किए गए संविधान के उपबंधों में व्यवस्था थी कि संसद के सदस्यों के विशेषाधिकार तब तक वही रहेंगे जो संविधान के प्रारंभ में ब्रिटिश हाउस आफ कामंस के, उसके सदस्यों के और समितियों के थे जब तक कि हमारी संसद, विधि द्वारा, पूर्णतया या अंशतया उनको परिभाषित नहीं करती। दूसरे शब्दों में, यदि संसद किसी समय किसी विशिष्ट विशेषाधिकार के संबंध में कोई उपबंध अधिनियमित करती है तो ब्रिटेन की पूर्वधारणाएं उस सीमा तक हमारी संसद पर लागू नहीं होंगी। परंतु 1978 में खंड (3) में संशोधन करके यह उपबंध किया गया कि संविधान में उल्लिखित विशेषाधिकारों के अलावा विशेषाधिकारों के संबंध में, संसद के प्रत्येक सदन की, उसके सदस्यों की और समितियों की शक्तियां, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां वही होंगी जो संविधान (चवालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1978 के प्रवृत्त होने से (20 जून, 1979 से) तुरंत पूर्व उस सदन की, उसके सदस्यों की और समितियों की थीं। इस संशोधन द्वारा वस्तुतया ब्रिटिश हाउस आफ कामंस के सभी निर्देशों का लोप करके केवल शाब्दिक परिवर्तन किए गए हैं, पर सार वही रहता है। दूसरे शब्दों में संविधान में उल्लिखित शक्तियों और विशेषाधिकारों के अलावा प्रत्येक सदन को, उसकी समितियों को और सदस्यों को व्यवहार में वही शक्तियां और विशेषाधिकार प्राप्त हैं, जो 26 जनवरी, 1950 को ब्रिटिश हाउस आफ कामस को प्राप्त थे। 


जैसाकि संविधान (संशोधन) विधेयक पर चर्चा का उत्तर देते हुए विधि मंत्री ने कहा था, अनुच्छेद 105 (3) में संशोधन करने का प्रयोजन यह था "कि मूल उपबंध में ब्रिटिश हाउस आफ कामंस का उल्लेख किया गया था। अब - भारत जैसा स्वाभिमानी देश अपने पावन संवैधानिक दस्तावेज में किसी विदेशी संस्था तत्कालीन का उल्लेख नहीं करना चाहेगा..... इस खंड के द्वारा यह शाब्दिक परिवर्तन किया जा रहा है ताकि एक विदेशी सरशा का उल्लेख न रहे। 


मुख्य विशेषाधिकार : 


संसदीय विशेषाधिकारों की रानियां तैयार की जा सकती हैं और वास्तव में तैयार की भी गई हैं परंतु ऐसी कोई भी सूची पूर्ण नहीं है। संसद के प्रत्येक सदन के, उसके सदस्यों और समितियों के महत्वपूर्ण विशेषाधिकार ये कहे जा सकते हैं.... 

(1) संसद में वाक्-स्वातंत्र्य [संविधान का अनुच्छेद 105 (1)]; 

(2) संसद में या उसकी किसी समिति में किसी सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कार्यवाही किए जाने से उन्मुक्ति [संविधान का अनुच्छेद 105 (2)]; 

(3) किसी व्यक्ति द्वारा संसद के किसी सदन के प्राधिकार द्वारा या उसके अधीन किसी रिपोर्ट, पत्र, मतों या कार्यवाहियों के प्रकाशन के संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कार्यवाही किए जाने से उन्मुक्ति [संविधान का अनुच्छेद 105 (2)]; 

(4) संसद की कार्यवाहियों की जांच करने के संबंध में न्यायालयों पर रोक (संविधान का अनुच्छेद 122); 

(5) सदन के अधिवेशन के दौरान और उसके प्रारंभ होने से 40 दिन पूर्व और उसके समाप्त होने के बाद 40 दिन तक दीवानी मामलों में सदस्यों का गिरफ्तार न किया जा सकना (सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 135 क) 

(6) जूरी के सदस्यों के रूप में कार्य करने के दायित्व से सदस्यों को छूट; 

(7) किसी सदस्य की गिरफ्तारी, नजरबंदी, दोषसिद्धि, कारावास और रिहाई के बारे में तुरंत सूचना प्राप्त करने का सदन का अधिकार (लोक सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन नियम, छठा संस्करण, नियम 229 और 230); 

(8) अध्यक्ष की अनुमति प्राप्त किए बिना सदन के परिसर में गिरफ्तारी और कानूनी आदेशिका की तामील पर रोक (लोक सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन नियम, छठा संस्करण, नियम 232 और 233); 

(9) सदन की किसी गोपनीय बैठक की कार्यवाहियां या फैसले प्रकट करने पर रोक (लोक सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियम, छठा संस्करण, नियम 252); 

(10) सदन के सदस्य या अधिकारी सदन की अनुमति के बिना सदन की कार्यवाहियों के संबंध में किसी न्यायालय में साक्ष्य नहीं देंगे या दस्तावेज पेश नहीं करेंगे (दूसरी लोक सभा की विशेषाधिकार समिति का प्रथम  प्रतिवेदन जो लोक सभा द्वारा 13 सितंवर, 1957 को स्वीकृत किया गया): 

(11) सदन के सदस्य या अधिकारी सदन की अनुमति के बिना दूसरे सदन के या उसकी किसी समिति के समक्ष या राज्य विधानमंडल के किसी सदन के या उसकी किसी समिति के समक्ष साक्षियों के रूप में उपस्थित नहीं होंगे और उन्हें संबंधित दोनों की सम्मति के बिना एसा करने पर मजबूर नहीं किया जा सकता (दूसरी लोक सभा की विशेषाधिकार समिति का छठा प्रतिवेदन जो लोक सभा द्वारा 17 सितदर, 1958 को स्वीकृत किया गया); 

(12) सभी संसदीय समितियों को किसी समिति द्वारा जांच के प्रयोजन के लिए संगत व्यक्तियों को बुलाने, पत्रों एवं अभिलेखों को मंगाने की शक्ति प्राप्त है। किसी संसदीय समिति द्वारा किसी साक्षी को बुलाया जा सकता है और उसे किसी समिति के प्रयोग के लिए अपेक्षित दस्तावेज पेश करने के लिए कहा जा सकता है (लोक सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन नियम, छठा संस्करण, नियम 269 और 270); 

(13) किसी संसदीय समिति के समक्ष किसी साक्षी को जांच के समय समिति उसे शपथ दिला सकती है या प्रतिज्ञान करा सकती है (लोक सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन नियम, छठा संस्करण, नियम 272), 

(14) किसी संसदीय समिति के समक्ष दिया गया साक्ष्य और उसका प्रतिवेदन तथा कार्यवाहियां किसी के द्वारा तब तक प्रकट या प्रकाशित नहीं की जा सकती जब तक कि उन्हें सभा पटल पर नहीं रख दिया जाता (लोक सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन नियम, छठा संस्करण, नियम 275)। 


उपयुक्त विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों के अतिरिक्त, प्रत्येक सदन को कतिपय आनुषंगिक शक्तियां भी प्राप्त हैं, जो उसके विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों के संरक्षण के लिए आवश्यक हैं। वे शक्तियां निम्नलिखित हैं


(1) व्यक्तियों को, चाहे वे सदस्य हों या नहीं हों, विशेषाधिकार भंग करने के कारण या सदन की अवमानना के कारण सुपुर्दगी की शक्ति; 

(2) साक्षियों को उपस्थित होने के लिए बाध्य करने और पत्र एवं अभिलेख मंगाने की शक्ति; 

(3) अपनी प्रक्रिया और अपने कार्य के संचालन को स्वयं विनियमित करने की शक्ति (संविधान का अनुच्छेद 118); 

(4) अपने वाद-विवाद और कार्यवाही-वृत्तांत के प्रकाशन पर रोक लगाने की शक्ति (लोक सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियम, छठा संस्करण, नियम 249); और 

(5) बाहर के व्यक्तियों की सदन में उपस्थिति पर रोक लगाने की शक्ति (लोक सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियम, छठा संस्करण, नियम 248)  


सबसे महत्वपूर्ण संसदीय विशेषाधिकार संसदीय कर्तव्यों का पालन करते समय वाक्-स्वातंत्र्य है। अनुच्छेद 19 द्वारा सभी नागरिकों को बोलने की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है परंतु अनुच्छेद 105 और 194 में विधानमंडलों के सदस्यों के बोलने की स्वतंत्रता के अधिकार पर विशेष बल दिया गया है। अनुच्छेद 19 के अधीन वाक्-स्वातंत्र्य का अधिकार युक्तियुक्त निर्बधनों के अध्यधीन है, उदाहरणार्थ, अपमान संबंधी विधि के अध्यधीन यदि कोई साधारण व्यक्ति को अपमानजक बात कहता है तो उसके विरुद्ध कार्यवाही की जा सकती है परंतु यदि कोई संसद सदस्य सदन में या उसकी समितियों में बोलता है तो उसके विरुद्ध इस आधार पर कार्यवाही नहीं की जा सकती कि उसका भाषण अपमानजनक या मानहानिकारक था। 


सदस्यों को लोगों की शिकायतें व्यक्त करनी होती हैं और लोक महत्व के विभिन्न मामले उठाने होते हैं। ऐसा करते हुए सदस्यों के लिए कोई रुकावटें नहीं होनी चाहिए और उन्हें अपने मन की बात कहने और अपने विचार व्यक्त करने की छूट होनी चाहिए। सदन में या संसद की समितियों में सदस्यों को पूरी आजादी होती है कि वे जो चाहे कहें और शर्त केवल इतनी है कि उन्हें सदन के या संबंधित समिति के आंतरिक अनुशासन में रहना होता है। इसके अतिरिक्त बाहर का कोई प्राधिकारी उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं रखता। संसद के सदनों में और समितियों में सदस्य अपने कृत्यों का निर्वहन बिना किसी भय या पक्षपात के कर सकें इसके लिए वाक्-स्वातंत्र्य पूर्णतया आवश्यक है। जब तक सदस्यों को यह उन्मुक्ति प्राप्त न हो कि उनके विरुद्ध कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती जब तक उनसे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे निर्बाध एवं स्पष्ट रूप से अपनी बात कह सकेंगे। अतः संविधान में उपबंध किया गया है कि किसी संसद सदस्य द्वारा संसद के सदनों में या उसकी किसी समिति में कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में या, संसद के अलावा, किसी प्राधिकारी के समक्ष कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती। संसद सदस्य द्वारा संसद में या उसकी किसी समिति में कही गई किसी बात के कारण उसे परेशान करना या उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही करना भी विशेषाधिकार भंग करना है। इसी तरह, किसी सदस्य द्वारा संसद या उसकी किसी समिति में कही गई किसी बात के संबंध में उसके विरुद्ध कोई कानूनी कार्यवाही करना विशेषाधिकार भंग करना है। किसी सदस्य द्वारा संसद में कही गई किसी बात के कारण उसे किसी न्यायालय में या संसद के बाहर किसी एजेंसी में चुनौती नहीं दी जा सकती। 


'सर्चलाईट' के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह फैसला दिया था कि अनुच्छेद 105 के अधीन सदस्यों को प्रदन वाक्-स्वातंत्र्य का अधिकार केवल संविधान के उन्हीं उपबंकों के, जो संसद की प्रक्रिया को विनियमित करते हैं, और सदन के नियमों एवं स्थायी आदेशों के अध्यधीन हैं, परंतु अनुच्छेद 19 (2) के अधीन किसी विधि द्वारा किसी साधारण नागरिक के वाक्-स्वातंत्र्य पर लगाए जाने वाले किन्हीं निर्वधन से मुक्त हैं। सदस्यों द्वारा अपने संसदीय कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए कही गई किसी बात या किए गए किसी कार्य के संबंध में संसद से बाहर कोई जांच सदरमा के अधिकारों में गंभीर हस्तक्षेप होगा। यद्यपि किसी सदस्य द्वारा सदन में दिए गा किसी भाषण से न्यायालय की अवमानना होती हो फिर भी किसी न्यायालय में उमर विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती। न्यायालय चूंकि संसद से बाहर का प्राधिकरण है अतः उसे ऐसे मामले की जांच करने की शक्ति प्राप्त नहीं है। अनुच्छेद 122 में संसद की कार्यवाहियों की न्यायालयों द्वारा किसी जांच की विशेष रूप में मनाही है। 


परंतु बाहरी प्रभाव या हस्तक्षेप से उन्मुक्तता का यह अर्थ नहीं है कि संसद की चारदीवारी के भीतर वैरोक टोक बोलने का अधिकार है। यह अधिकार संविधान के उपबंधों के अध्यधीन है। उदाहरणार्थ, अनुच्छेद 121 में उपबंध है कि उच्चतम न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश के, उसके कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए, आचरण के विषय में संसद में कोई चर्चा, उस न्यायाधीश को हटाने की प्रार्थना करने वाले समावेदन को राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करने के प्रस्ताव पर ही होगी, अन्यथा नहीं। सदन के प्रक्रिया नियमों के नियम 352 और 353 में, अन्य बातों के साथ-साथ किसी व्यक्ति के विरुद्ध अनुचित आरोप लगाने पर रोक लगाई गई है और सदन के सदस्यों या मंत्रियों द्वारा गलत वक्तव्य दिए जाने पर उपचारात्मक उपायों का उपबंध किया गया है। जब कोई सदस्य किसी प्रतिबंध का उल्लंघन करता है तो अध्यक्ष उसे अपना भाषण वहीं समाप्त करने के लिए निदेश दे सकता है या आदेश दे सकता है कि सदस्य द्वारा प्रयोग में लाए गए मानहानिकारक, अशिष्ट, असंसदीय या अभद्र शब्द वापस लिए जाएं या उन्हें सदन के कार्यवाही-वृत्तांत से निकाल दिया जाए। जब कोई सदस्य उक्त आदेश का घोर उल्लंघन करता है, तो अध्यक्ष उसे सदन से बाहर चले जाने का निदेश भी दे सकता है और/अथवा सदस्य को सदन की सेवा से निलंबित करने की कार्यवाही आरंभ कर सकता है। 


कोई सदस्य न केवल उस समय गिरफ्तार नहीं किया जा सकता जबकि उस सदन का, जिसका कि वह सदस्य हो, अधिवेशन चल रहा हो या जबकि उस संसदीय समिति की, जिसका वह सदस्य हो, बैठक चल रही हो या जब कि दोनों सदनों की संयुक्त बैठक चल रही हों, बल्कि संसद के अधिवेशन के प्रारंभ से 40 दिन पूर्व और उसकी समाप्ति से 40 दिन पश्चात या जबकि वह सदन को आ रहा हो या सदन से बाहर जा हा हो, उब भी उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यदि कोई सदस्य संसद या उसकी किसी समिति का कोई कार्य करने के लिए नई दिल्ली आ रहा हो तो नई दिल्ली से बाहर किसी स्थान पर उसे परेशान किया जाना या कोर्ट बाधा उपस्थित किया जाना भी विशेषाधिकार को भंग करना होगा । 


इस विशेषाधिकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सदस्या मुरदिल पहुंचा आए और संसद में नियमित रूप से उपस्थित हो । यद्यपि सदस्यों को केवल दीवानी मामलों में गिरफ्तारी से उन्मुक्ति प्राप्त है और आपराधिक मामलों में या निवारक निरोध विधि के अधीन गिरफ्तारी से उन्मक्ति प्राप्त नहीं है, तथापि सदन को किसी सदस्य की गिरफतारी, नजरबंदी, दोषसिद्धि, कारावास और रिहाई के बारे में तुरंत सूचना प्राप्त करने का अधिकार है। संबंधित प्राधिकारी का यह कर्तव्य बनता है कि वह लोक सभा के किसी सदस्य की प्रत्येक गिरफ्तारी, नजरबंदी या कारावास की सूचना तुरंत अध्यक्ष को दे। यदि कोई प्राधिकारी ऐसा नहीं करता लो सदन के विशेषाधिकार के भंग होने का मामला बन जाता है। ऐसी सूचना यथासमय, शीत्र से शीघ्र दी जानी होती है। चाहे सदस्य देश के किसी भी भाग में गिरफ्तार हो उसकी सूचना तार भेजकर अवश्य दी जानी चाहिए और बाद में पत्र द्वारा उसकी पुष्टि की जानी चाहिए।  


यह निर्धारित है कि संसद के परिसरों के भीतर, अध्यक्ष सभापति की अनुमति के बिना, दीवानी या आपराधिक कोई कानूनी आदेशिका-कोई “समान” दिए नहीं जा सकते और कोई सदस्य गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। संसद के परिसरों के भीतर यह उन्मुक्ति किसी गैर-सरकारी व्यक्ति को भी प्राप्त होती है। इस प्रकार अध्यक्ष/सभापति की अनुमति के बिना संसद भवन के अंदर किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया जा सकता क्योंकि संसद के परिसरों में केवल संसद के सदन के या अध्यक्ष/सभापति के आदेशों का पालन होता है और अन्य किसी सरकारी प्राधिकारी के या स्थानीय प्रशासन के आदेश का पालन नहीं होता। यहां तक कि धारा 144 भी संसद के परिसरों में लागू नहीं की जा सकती। यदि प्राधिकारी कभी ऐसा करने की सोचें तो वह विशेषाधिकार भंग करने और सदन की अवमानना करने का मामला बन जाएगा। यह अलग बात है कि संसद के परिसरों के भीतर अध्यक्ष का कोई आदेश लागू हो जो धारा 144 के उपबंधों के समान हो। 


सदस्य आपराधिक मामलों में जूरी के सदस्य के रूप में कार्य करने के दायित्व से मुक्त हैं। यद्यपि जहां कहीं जूरी की प्रणाली विद्यमान हो, वहां प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य बनता है कि वह जूरी के सदस्य के रूप में सेवा करे, परंतु संसद के सदस्यों और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों को इस मामले में छूट दी गई है। 


विधानमंडल सचिवालय के किसी अधिकारी को या किसी अन्य व्यक्ति को, सदन की अनुमति के बिना, किसी सदन की कार्यवाही के संबंध में साक्ष्या देने या कोई दस्तावेज पेश करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार किसी  सदस्य को, उस सदन की अनुमति के बिना जिसका वह सदस्य हो, दूसरे सदन के समक्ष साक्षी के रूप में उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। 


सभी संसदीय समितियों को यह शक्ति प्राप्त है कि वे व्यक्तियों को बुला सकती हैं और पत्र एवं अभिलेख मंगवा सकती हैं। किसी समिति के समक्ष किसी साक्षी के निम्न प्रकार के आचरण से विशेषाधिकार भंग होता है और समिति की अवमानना होती है :


(1) प्रश्नों के उत्तर देने से इंकार करना; 

(2) टाल-गटोल करना या जानाकर गलत साक्ष्य देना या सचाई छिपाना या समिति को गुमराह करना; 

(3) समिति के साथ हल्के-फुल्के ढंग से पेश आना और अपमानजनक उत्तर देना; और 

(4) समिति द्वारा की जाने वाली जांच से संबंधित किसी सारवान दस्तावेज को नष्ट करना या क्षतिग्रस्त करना। 


संसद की समितियां वैसे ही सम्मान की अधिकारी हैं जैसे कि स्वयं संसद है। अतः यदि कोई व्यक्ति किसी संसदीय समिति के फैसलों पर या आचरण पर आक्षेप करता है तो उसे विशेषाधिकार भंग करना और सदन की अवमानना करना माना जाता है। 


इसके अतिरिक्त, विशेषाधिकार विधि के अंग के रूप में, हिरासत में लिए गए किसी सदस्य को यह अधिकार है कि वह किसी संसदीय समिति के अध्यक्ष/सभापति के साथ बिना रुकावट के पत्राचार कर सकता है। हिरासत में लिए गए किसी व्यक्ति द्वारा इस प्रकार संबोधित पत्र आदि को प्रशासनिक प्राधिकारियों द्वारा रोका नहीं जा सकता। 


जब कोई मामला किसी संसदीय समिति के विचाराधीन हो और वह समिति उस प्रयोजन के लिए प्रतिदिन अपनी बैठकें कर रही हो तो संसद के किसी सदस्य सहित किसी भी व्यक्ति को उस मामले के बारे में कोई वक्तव्य नहीं देना चाहिए या टिप्पणी नहीं करनी चाहिए या उसे प्रकाशित नहीं करना चाहिए। किसी संसदीय समिति के विचाराधीन किसी मामले पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणियां करना बहुत अनुचित है और वह सदन की अवमानना भी हो सकती है। किसी समिति के कार्यवाही-वृत्तांत को या उसे प्रस्तुत किए गए किसी दस्तावेज या पत्र को प्रकाशित करना भी सदन का विशेषाधिकार भंग करना माना जा सकता है। 


विशेषाधिकार भंग : 


सामूहिक रूप से सदन के या उसकी समितियों के या व्यक्तिगत रूप से उसके सदस्यों के किसी विशेषाधिकार, अधिकार या उन्मुक्ति की किसी न्यक्ति द्वारा या प्राधिकारी द्वारा आलोचना करने या उसके प्राण असम्मान प्रदर्शित करने से विशेषाधिकार भंग हो सकता है। यह ऐसा अपराध है जिसके लिए सदन द्वारा दंड दिया जा सकता है। मूल सिद्धांत यह है कि सदनों, समितियीं या संसद के सदस्यों द्वारा अपने कर्तव्यों और कृत्यों का प्रभावी और कुशल ढंग से और बिना भय या पक्षपात के निर्वहन करने में बाधा उपस्थित करने वाला, रुकावट डालने वाला या आड़े आनेवाला कोई भी कार्य संसदीय विशेषाधिकार भंग करने वाला माना जाएगा। इस प्रकार, सदन की बैठक में उपस्थित होने के लिए किसी सदस्य को जाने से रोकना विशेषाधिकार भंग का मामला होगा। सदन को जानबूझकर गुमराह करना या सदन को जानबूझकर गलत जानकारी देना भी गंभीर अपराध है। इसके अतिरिक्त, विशिष्ट विशेषाधिकारों को भंग करना, सदन के प्राधिकार और गरिमा के विरुद्ध अपराध करना, जैसे उसके वैध आदेशों को न मानना या उसका, उसके सदस्यों का या अधिकारियों का उस नाते अपमान करना भी सदन की अवमानना के रूप में दंडनीय है। 


सदन की अवमानना : 


सामान्य रूप से ऐसी कोई भी कार्यवाही करना या न करना सदन की अवमानना हो सकती है जो संसद के किसी सदन, या उसकी समितियों या उसके सदस्यों या उसके अधिकारियों के लिए अपने कृत्यों एवं कर्तव्यों के कुशल एवं प्रभावी निर्वहन में बाधा उपस्थित करती है या जिसकी प्रवृत्ति, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, सदन की, उसकी समितियों की या उसके सदस्यों की गरिमा या सम्मान कम करने की होती है। विशेषाधिकार भंग और सदन की अवमानना में बहुत थोड़ा-सा अंतर है। साधारणतया ऐसा हो सकता है कि विशेषाधिकार भंग होने से सदन की अवमानना होती है। इसी तरह सदन की अवमानना होने से विशेषाधिकार  परंतु सदन की अवमानना के आशय अपेक्षतया व्यापक हैं। विशेष रूप से विशेषाधिकार भंग किए बिना सदन की अवमानना हो सकती है। वास्तव में, अवमानना शब्द की निश्चित परिभाषा करना कठिन है। किसी परिस्थिति में कोई विशेष कार्य अवमानना हो सकता है तो किसी अन्य परिस्थिति में वही कार्य अवमानना नहीं भी हो सकता। दूसरे शब्दों में, इस बात का निर्णय संसद का संबंधित सदन ही कर सकता है कि अवमानना की गई है या नहीं। 


मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि संसद के दोनों सदनों और उनकी समितियों की सर्वोच्चता, प्राधिकार या गरिमा पर किया गया कोई भी प्रहार उनकी अवमानना है। कुछ कार्य जो सदन की अवमानना समझे जा सकते हैं, इस प्रकार हैं


सदनों, उनकी समितियों या उनके सदस्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले भाषण और लेखनियां, जिनका उद्देश्य उन्हें बदनाम करना या लोगों की नजर में उनकी प्रतिष्ठा भंग हो सकता कम करना हो; 


अध्यक्ष/सभापति द्वारा अपने कर्तव्यों के निर्वहन में उसके चरित्र या निष्पक्षता को चुनौती देना; 


किसी संसदीय समिति द्वारा अपने प्रतिवेदन में पक्षपात किए जाने का आरोप लगाना; 

कार्यवाहियों को गलत ढंग से प्रकाशित करना; 

पीठासीन अधिकारी द्वारा कारवाही त्यांत से निकाल दिए गए अंशों को और सक्षा के गुप्त अधिवेशनों की कार्यवाहियों को प्रकाशित करना; 


सदन में सदस्यों के आचरण के कारण उन्हें परेशान करना या सदस्यों के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करते समय उनके लिए बाधा उपस्थित करना या जब वे सदन या उसकी समिति की बैठक में उपस्थित होने के लिए जा रहे हों या वहां से आ रहे हों तो उस समय उनके लिए बाधा उपस्थित करना; 


सदस्यों को उनके संसदीय आचरण से प्रभावित करने के लिए उन्हें घूस की पेशकश करना; 


सदस्यों के संसदीय आचरण के संबंध में उन्हें डराना; 


किसी सदस्य द्वारा या साक्षी द्वारा सदन के समक्ष या उसकी किसी समिति के समक्ष जानबूझकर गलत या गुमराह करने वाला साक्ष्य या सूचना देना; और 


सदन के समक्ष या उसकी किसी समिति के समक्ष उपस्थित होने वाले किसी साक्षी के लिए बाधा डालना या उसे परेशान करना। 


ऐसे मामले जिनसे विशेषाधिकार भंग नहीं होता : 


कुछ ऐसी संसदीय पद्धतियां, मान्यताएं तथा प्रथाएं हैं जिनका कि सदस्यों और अन्य संबंधित लोगों द्वारा पालन किया जाना चाहिए। परंतु उन पद्धतियों और प्रधाओं का उल्लंघन करने से तकनीकी रूप से विशेषाधिकार भंग नहीं होता या अवमानना नहीं होती यद्यपि ऐसः उल्लंघन अनुचित हो सकता है। उदाहरणार्थ, औचित्य की मांग है कि जब सदन का अधिवेशन चल रहा हो तो नीति संबंधी वक्तव्य सदन से बाहर नहीं देने चाहिए; सरकारी अधिकारियों और अन्य लोगों द्वारा सार्वजनिक समारोहों में संसद के सदस्यों के प्रति उचित शिष्टता दिखानी चाहिए; जो संसदीय समितियां दौरे पर हों उन्हें उचित सुविधाएं दी जानी चाहिए और उनके साथ शिष्टता से पेश आना चाहिए; परंतु औचित्य की इन बातों के उल्लंघन से संसदीय विशेषाधिकार भंग नहीं होता। 


विशेषाधिकार भंग, अवमानना आदि के लिए दंड : 


संसद का प्रत्येक सदन अपने विशेषाधिकार का स्वयं ही रक्षक होता है। जिस व्यक्ति को विशेषाधिकार भंग करने या सदन की अवमानना करने के लिए दोषी पाया जाए, सदन उसकी भर्त्सना करके या ताड़ना करके या निर्धारित अवधि के लिए कारावास द्वारा दंडित कर सकता है। स्वयं अपने सदस्यों के मामले में सदन अन्य दो प्रकार के दंड दे सकता है, अर्थात सदन की सेवा से निलंबित करना और निष्कासित करना। किसी सदस्य को एक निर्धारित अवधि के लिए सदन की सेवा से निलंबित किया जा सकता है या किसी अति गंभीर मामले में उसे सदन से निष्कासित किया जा सकता है। 


साधारणतया, जिन मामलों में विशेषाधिकार भंग होने या अवमानना होने का अपराध गंभीर नहीं होता वहां संबंधित व्यक्ति को सदन की 'बार' में बुलाया जा सकता है, और सदन के आदेश से अध्यक्ष या सभापति द्वारा, जैसी भी स्थिति हो, उसकी ताड़ना पा पर्सना की जाती है। ताना करना सबसे नरम किरम का दंड है और भत्र्सना करना अधिक गंभीर किरम का दंड है, जिसके द्वारा सदन की अप्रसन्नता भक्त की जाती है। सदन अपराधियों को ऐसी अवधि के लिए कारावास का दंड दे सकता है जो साधारणतया सदन के अधिवेशन की अवधि से अधिक नहीं होती। जैसे ही सदन का सत्रावसान होता है, बंदी को मुक्त कर दिया जाता है। दर्शकों द्वारा दर्शक गैलरी से नारे लगाकर और/अथवा इश्तिहार फेंककर सदन की अवमानना करने के कारण, दोनों सदनों ने, समय-समय पर, आपराधियों को सदन के उस दिन स्थगित हो। तक, कारावास का दंड दिया है। 


सदन का दांडिक अधिकार क्षेत्र अपने सदस्यों तक और उसके सामने किए गए अपराधों तक ही सीमित न होकर सदन की सभी अवमाननाओं पर व्याप्त होता है, चाहे अवमानना सदस्यों द्वारा की गई हो या ऐसे व्यक्तियों द्वारा जो सदस्य न हों। इससे भी कोई अंतर नहीं पड़ता कि अपराध सदन के भीतर किया गया है या उसके परिसर से बाहर । सदन का विशेषाधिकार भंग करने या उसकी अवमानना करने के कारण व्यक्तियों को दंड देने की सदन की यह शक्ति संसदीय विशेपाधिकार की नींव है। यही शक्ति है जिसके कारण संसद के विशेषाधिकार वास्तविकता का रूप लेते हैं और, जहां तक इसके अधिकारों का, संरक्षण का और गरिमा और प्राधिकार बनाए रखने का संबंध है, यही शक्ति इसके प्रभुसत्ता पूर्ण स्वरूप पर बल देती है। 


परंतु विशेषाधिकार भंग होने पर सदन की अवमानना होने के कारण सदन की दांडिक शक्तियों का प्रयोग बहुत ही गंभीर मामलों में किया जाता है जहां संसद की संस्था के प्रति असम्मान की भावना पैदा करने और संसद में लोगों का विश्वास समाप्त करने के लिए जानबूझकर प्रयास किया गया हो। सदन की ऐसी परंपरा भी रही है कि सदन का विशेषाधिकार भंग करने या सदन की अवमानना करने के दोषी व्यक्तियों द्वारा स्पष्ट रूप से और बिना किसी शर्त के दिल से व्यक्त किया गया खेद सदन द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है और साधारणतया सदन अपनी गरिमा को देखते हुए ऐसे मामलों पर अग्रेतर कार्यवाही न करने का निर्णय करता है। 


विशेषाधिकार के प्रश्नों संबंधी प्रक्रिया : 


विशेषाधिकार के प्रश्नों के संबंध में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया लोक सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन नियमों के नियम 222 से 228 और 313 से 316 में निर्धारित है। जो सदस्य विशेषाधिकार का कोई प्रश्न उठाना चाहता हो उसे महासचिव को अपने इस आशय की सूचना देनी होती है। ऐसी सूचना दिन की बैठक के प्रारंभ होने से पहले देनी होती है। यदि उठाया जाने वाला प्रश्न किसी दस्तावेज पर आधारित हो तो सूचना के साथ वह दस्तावेज संलग्न होना चाहिए। उस सूचना की जांच करने के बाद यदि अध्यक्ष का विचार हो कि विशेषाधिकार भंग होने का प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता या कि  उठाया जाने वाला मामला नियमानुकूल नहीं है तो मामला उठाने के लिए वह अपनी सम्मति देने से इंकार कर सकता है। संबंधित सदस्य को अध्यक्ष के निर्णय की सूचना  दे दी जाती है। अध्ययक्ष के इस निर्णय की कि उसने सदन में मामला उठाने के लिए अपनी सम्पति रोक ली है, सूचना सदस्य को दे दिए जाने के पश्चात सदस्य को सदन में मामला उठाने की अनुमति नहीं होती। परंतु यदि सदस्य उससे संतुष्ट न हो तो वह अपने मामले की व्याख्या करने के लिए अध्यक्ष के कक्ष में उससे मिल सकता है। यह प्रक्रिया इसलिए निर्धारित की गई है कि जो मामला प्रथम दृष्टया गृहीत करने योग्य न हो उसे उठाने से सदन का समय व्यर्थ न जाए। जहां मामला अविलंबनीय स्वरूप का हो और सूचना देने का समय न हो तो अध्यक्ष, लिखित पूर्व सूचना के बिना, सदस्य को विशेषाधिकार का प्रश्न उठाने की अनुमति दे सकता है। 


इस प्रश्न का निर्णय केवल सदन कर सकता है कि जिस मामले की शिकायत की गई है क्या वह वास्तव में विशेषाधिकार भंग का या सदन की अवमानना का मामला है, क्योंकि केवल सदन ही अपने विशेषाधिकार का स्वामी है। अध्यक्ष जब किसी मामले को विशेषाधिकार के प्रश्न के रूप सदन में उठाए जाने के लिए अपनी सम्मति देता है तो वह केवल यही विचार करता है कि क्या वह मामला अग्रेतर जांच योग्य है और क्या उसे सदन के समक्ष लाया जाना चाहिए। विशेषाधिकार का प्रश्न किसी सदस्य द्वारा शीघ्रातिशीघ्र उठाया जाना चाहिए और उसमें सदन का हस्तक्षेप अपेक्षित होना चाहिए। यदि अध्यक्ष समझता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है तो वह स्वयं ही उसे विशेषाधिकार समिति को निर्दिष्ट कर सकता है। या उसे सदन में उठाए जाने के लिए अपनी सम्मति दे सकता है। अध्यक्ष द्वारा सम्मति प्रदान किए जाने के पश्चात सदस्य, अध्यक्ष द्वारा पुकारे जाने पर, विशेषाधिकार भंग होने का प्रश्न उठाने के लिए सदन की अनुमति मांगता है। ऐसी अनुमति मांगते समय, संबंधित सदस्य को विशेषाधिकार के प्रश्न से संगत केवल छोटा-सा वक्तव्य देने की अनुमति दी जाती है। यदि अनुमति दिए जाने पर आपत्ति की जाती है तो अध्यक्ष उन सदस्यों से अपने स्थान पर खड़े होने के लिए अनुरोध करता है जो अनुमति दिए जाने के पक्ष में हैं। तदनुसार, यदि पच्चीस या पच्चीस से अधिक सदस्य खड़े होते हैं तो यह मान लिया जाता है कि सदन ने वह मामला उठाने की अनुमति दे दी है। अध्यक्ष घोषणा करता है कि अनुमति दी जाती है; अन्यथा अध्यक्ष सदस्य को सूचित करता है कि वह मामला उठाने के लिए सदन ने अनुमॆति नहीं दी है। 


सदन में विशेषाधिकार का कोई प्रश्न उठाने की अनुमति केवल वही सदस्य मांग सकता है जिसने विशेषाधिकार के प्रश्न की सूचना दी हो। वह किसी अन्य सदस्य को उसकी ओर से पंजाब से के लिए प्राधिकृत नहीं कर सकता । विशेषाधिकार के किसी प्रश्न को कार्य सूची में सत्य कार्य भदों से वरीयता दी जाती है । तदनुसार, विशेषाधिकार का कोई प्रश्न याने क लिए अनुमति प्रश्नकाल के पश्चात और कार्य की अन्य मदों के विचारार्थ लिए जाने से पूर्व मांगी जाती है। परंतु अविलंबनीय मामले, जिनके लिए सदन को तुरंत हस्तक्षेप अपेक्षित हो, प्रश्नों के निपटाए जाने के पश्चात सदन की बैठक के दौरान किसी भी समय उठाने की अध्यक्ष द्वारा अनुमति दी जाती है, परंतु ऐसे अवसर बहुत कम आते हैं। 


सदन सारा अनुमति प्रदान किए जाने के पश्चात सदन मामले पर स्वयं विचार कर सकता है और निर्णय कर सकता है या उसकी जांच करने, छानबीन करने और प्रतिवेदन देने के लिए उसे विशेषाधिकार समिति को निर्दिष्ट कर सकता है। परंतु सामान्य प्रथा यह है कि शिकायत का मामला समिति को निर्दिष्ट कर दिया जाता है और सदन समिति का प्रतिवेदन प्राप्त होने तक अपना निर्णय स्थगित रखता है। संदन यदि यह देखता है कि कोई मामला बहुत तुच्छ है या जब अपराधी माफी मांग लेता है तो सदन स्वयं यह निर्णय करके मामले को निपटा देता है कि उस पर अग्रेतर कार्यवाही करना आवश्यक नहीं रहा। 


समिति का प्रतिवेदन सदन में प्रस्तुत हो जाने के पश्चात समिति का सभापति या समिति का कोई सदस्य या कोई भी अन्य सदस्य प्रस्ताव रख सकता है कि प्रतिवेदन पर विचार किया जाए। प्रतिवेदन पर विचार किए जाने के पश्चात समिति का सभापति या समिति का कोई भी अन्य सदस्य या कोई अन्य सदस्य प्रस्ताव कर सकता है कि प्रतिवेदन में की गई सिफारिशों के साथ सदन सहमत है या असहमत है या संशोधनों के साथ सहमत है। इस प्रस्ताव को कि विशेषाधिकार समिति के प्रतिवेदन पर विचार किया जाए, वही प्राथमिकता दी जाती है जो लोक सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन नियमों के नियम 225 के अधीन विशेषाधिकार के किसी प्रश्न को दी जाती है। अग्रेतर कार्यवाही समिति के प्रतिवेदन पर सदन के निर्णय के अनुसार की जाती है। 


व्यवहार में संसद के सदन विशेषाधिकार भंग के मामलों में सदा अधिकतम उदार रहे हैं। अब तक कुछ ही मामलों में कार्यवाही की गई है। जहां व्यक्तियों द्वारा या प्रेस द्वारा विशेषाधिकार भंग किया गया या अवमानना की गई, संसद के सदनों ने ऐसे बहुत ही कम मामलों में सख्त दृष्टिकोण अपनाया है। अधिकांश मामलों में उनका यही विचार रहा है कि प्रत्येक तुच्छ और महत्वहीन मामले की ओर ध्यान देना सदन की गरिमा के अनुकूल नहीं है और इससे उन लोगों या तत्वों को अनुचित महत्व मिलेगा जो ऐसी स्थितियां उत्पन्न करते हैं। 


केवल संसद ही अपने विशेषाधिकारों की निर्णायक : 


कभी कभी तथाकथित 'उच्चतम न्यायालय के निर्णय' का उल्लेख किया जाता है, जिसकी रिपोर्ट ए.आई. आर. 1965 उच्चतम न्यायालय 745 में प्रकाशित हुई थी। वास्तव में वह कोई निर्णय नहीं था बल्कि भारत के राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 143 के अधीन 25 मार्च, 1964 को निर्दिष्ट किए गए विशेष मामले पर उच्चतम न्यायालय की राय  थी। वह मामला विशेषाधिकार भंग करने और सदन की अवमानना करने के कारण उत्तर प्रदेश विधान सभा द्वारा श्री केशव सिंह को कारावास का दंड और उनको मुक्त किए जाने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दायर की गई उनकी रिट याचिका के बारे में था जिसके कारण अनेक घटनाएं घटीं और राज्य विधानमंडलों और उनके सदस्यों की शक्तियों एवं विशेषाधिकारों के संबंध में उच्च न्यायालय और उनके न्यायाधीशों की शक्तियों एवं अधिकार क्षेत्र संबंधी विधि के महत्वपूर्ण और जटित्त प्रश्न उठ खड़े हुए थे। 


भारत में न्यायालयों ने यह बात मानी है कि किसी विशेष मामले में विशेषाधिकार भंग हुआ है या नहीं हुआ है, इस प्रश्न का निर्णय करने का अधिकार केवल संसद या राज्य विधानमंडल के सदन को है। यह भी निर्णय दिया गया है कि अवमानना करने के कारण दंड देने की सदन की शक्ति वैसी ही है जैसे कि हाउस आफ कामंस की है और उस शक्ति के प्रयोग की छानबीन करने के लिए कोई न्यायालय अक्षम होगा। 


1959 में, सर्चलाईट मामले में 


उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया

अनुच्छेद 194 के खंड (2) के उपबंधों के अनुसार खंड (1) में निर्दिष्ट वाक्-स्वातंत्र्य उस वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य से भिन्न है जिसकी गारेटी अनुच्छेद 19 (1) (क) के अधीन दी गई है और उसमें अनुच्छेद 19 के खंड (2) द्वारा परिकल्पित किसी विधि द्वारा किसी भी तरह कमी नहीं की जा सकती।" 

अनुच्छेद 105 (2) और 194 (2) के उपबंध सवैधानिक विधियां हैं न कि संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई साधारण विधियां और वे उसी प्रकार सर्वोच्च हैं जिस प्रकार भाग तीन (मूल अधिकारों से संबंधित अनुच्छेद) के उपई हैं। 

"सुसंगत अर्थान्वयन का सिद्धांत अवश्य अपनाया जाना चाहिए और उसी प्रकार अर्थ लगाए जाने चाहिए, कि अनुच्छेद 19 (1) (क) के उपबंध, जो सामान्य हैं, अनुच्छेद 194 (1) के और इसके खंड (3) के बाद वाले भाग, जो विशेष हैं, के अधीन होने चाहिए।" 


1965 में, उच्चतम न्यायालय ने, 1964 के उपर्युक्त विशेष रूप से निर्दिष्ट मामलों में (केशव सिंह के मामले में) अपनी परामर्शदात्री राय में ये टिप्पणियां कीं : 


सर्चलाईट मामले में बहुमत के निर्णय का यह अर्थ लगाना सही नहीं होगा कि उसके द्वारा सामान्य सिद्धांत निर्धारित किया गया है कि जहां कहीं अनुच्छेद 194 (9) के बाद वाले भाग के उपबंधों और भाग 3 में प्रत्याभूत मूल अधिकारों के किसी भी उपबंध के बीच टकराव हो तो बाद में उल्लिखित उपबंध पहले उल्लिखित उपबंधों के अधीन होगा। अतः बहुमत के निर्णय का यही अर्थ लगाना चाहिए कि यह निर्णय दिया गया है कि अनुच्छेद 19 (1) (क) लागू नहीं होगा और अनुच्छेद 21 लागू होगा।


अनुच्छेद 194 के खंड (9) में किए गए उपबंधों के प्रभाव के संबंध में जब कभी ऐसा प्रतीत हो कि उक्त उपबंधों और मूल अधिकारों संबंधी उपबंधों के बीच टकराव है तो सुसंगत अर्थान्चयन का नियम अपनाकर उक्त टकराव का समाधान करने का प्रयास करना होगा।" 


यहां यह बता दिया जाए कि सर्चलाईट मामले में उच्चतम न्यायालय का निर्णय अभी तक अंतिम है और उस मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित मार्गदर्शी सिद्धांत ऐसे सभी मामलों में लागू होने वाले माने गए हैं। 


भारत में विधायी निकायों के पीठासीन अधिकारियों के 11 और 12 जनवरी, 1965 को मुंबई में हुए सम्मेलन में उच्चतम न्यायालय की राय पर विचार किया गया। सम्मेलन ने सर्वसम्मति से एक संकल्प स्वीकृत किया जिसमें यह विचार व्यक्त किया कि संविधान के निर्माताओं के आशय पूर्णतः स्पष्ट करने के लिए, जिससे किसी संदेह की गुंजाइश न रहे, अनुच्छेद 105 और 194 में उपयुक्त संशोधन किए जाने चाहिए ताकि विधानमंडलों, उनके सदस्यों और समितियों की शक्तियां, विशेषाधिकार एवं उन्मुक्तियां किसी भी मामले में संविधान के किसी अन्य अनुच्छेद के अध्यधीन या अधीन न समझी जाएं। 


इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने केशव सिंह मामले में 10 मार्च, 1965 के अपने निर्णय में, अर्थात उच्चतम न्यायालय की परामर्शदात्री राय प्राप्त होने के पश्चात दिए गए निर्णयों में, ये टिप्पणियां की : 


(1) "प्राधिकार के अनुसार और संविधान के संगत उपबंधों के संगत उपबंधों पर विचार करने पर, हमारी राय है कि यही उचित है कि विधानसभा को, अनुच्छेद 194 (3) के कारण, अपनी अवमानना किए जाने पर दंड देने की वही शक्ति प्राप्त है जो कि हाउस आफ कामंस को प्राप्त है।" 


(2) “हमारी राय है कि संविधान के अनुच्छेद 22 (2) के उपबंध सक्षम प्राधिकारी द्वारा दोषसिद्धि के और कारावास का दंड लागू किए जाने के अनुसरण में नजरबंदी पर लागू नहीं हो सकते।" 


(3) "हम चूंकि पहले ही निर्णय दे चुके हैं कि विधानसभा को अपनी अवमानना किए जाने के कारण प्रार्थी को दंड देने की शक्ति प्राप्त है और चूंकि विधानसभा ने अनुच्छेद 208 (1) के अधीन अपनी प्रक्रिया तथा कार्य संचालन के नियम बनाए हैं, अतः प्रार्थी का दंडित किया जाना और उसको वैयक्तिक स्वतंत्रता से वंचित किया जाना संविधान अनुच्छेद 21 के अर्थों में विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुकूल के ही ठहराया जा सकता है।


(4) “एक बार जब हम इस निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं कि विधानसभा को उसकी अवमानना किए जाने के कारण दंड देने और प्रार्थी पर दंड को लागू करने की शक्ति है और ऐसा करना उसके अधिकार क्षेत्र में है तो दंड के सही होने, उसके औचित्य या वैधता के प्रश्न में नहीं जा सकते। यह न्यायालय, संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन किसी याचिका में, विधानसभा द्वारा उसकी अवमानना किए जाने के कारण प्रार्थी को दंडित करने के निर्णय के विरुद्ध अपील का निर्णय नहीं कर सकता। विधानसभा अपनी प्रक्रिया स्वयं निर्धारित करती है और इस प्रश्न का निर्णय केवल वही कर सकती है कि उसकी अवमानना की गई है या कि नहीं की गई है।" 


इस निर्णय के परिप्रेक्ष्य में सरकार ने निर्णय किया कि संविधान में संशोधन करना आवश्यक नहीं है। सरकार का विचार था कि उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई राय और इलाहाबाद उच्च न्यायालाय द्वारा दिए गए निर्णय के प्रकाश में विधानमंडल और न्यायपालिका स्वयं अपनी प्रथाएं विकसित करेंगी। 


संसदीय विशेषाधिकार और प्रेस : 


प्रेस को प्रायः संसद का विस्तार कहा जाता है। प्रेस संसदीय विधान और चर्चाओं का सार लोगों को बताता है और संसद में जो कुछ होता है उससे लोगों को अवगत कराता है। संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता का स्पष्ट रूप से कोई उपबंध नहीं है परंतु संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के अधीन नागरिकों को प्रत्याभूत “वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य" के मूल अधिकार में यह अंतर्निहित है। न्यायिक निर्णयों द्वारा यह तय किया गया है कि वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य में प्रेस की स्वतंत्रता सम्मिलित है। सदन की कार्यवाही से निकाले गए अंश प्रकाशित करना विशेषाधिकार भंग करना और सदन की अवमानना करना है। संसद के प्रत्येक सदन की कार्यवाहियों के प्रकाशन से संबंधित सभी व्यक्तियों को, यदि ऐसा प्रकाशन सदन द्वारा या सदन के प्राधिकार से किया जाए, संविधान के अधीन, किसी न्यायालय में कार्यवाही से पूर्ण उन्मुक्ति प्रदान की गई है (अनुच्छेद 105) (2) परंतु यह उन्मुक्ति संसदीय कार्यवाहियों की रिपोर्ट समाचारपत्रों में प्रकाशित करने के मामले में प्रदान नहीं की गई है, चाहे वे सदन के किसी सदस्य द्वारा प्रकाशित की जाएं या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा, जब तक कि किसी सदन द्वारा ऐसे प्रकाशन के लिए स्पष्टतया प्राधिकृत किया न गया हो। संसद के प्रत्येक सदन की किसी कार्यवाही की मूल रूप से सही रिपोर्ट समाचारपत्रों में प्रकाशित करने या वायरलैस टेलीग्राफी द्वारा प्रसारित करने के लिए सांविधिक संरक्षण दिया गया है बशर्ते कि वह रिपोर्ट सार्वजनिक हित में हो और दुर्भावना न की गई हो (संविधान का अनुच्छेद 361 क)। 


उक्त संरक्षण इस सीमा के साथ प्रदान किया गया है कि सदन को अपने से वाद-विवाद या कार्यवाहियां प्रकाशित करने पर नियंत्रण रखने और यदि आवश्यक हो तो उनके प्रकाशन पर रोक लगाने और अपने आदर्शों का उल्लंघन करने वालों को दंड देने की शक्ति प्राप्त है। साधारणतया, सदन की कार्यवाहियों की रिपोर्ट प्रकाशित करने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाता। परंतु यदि रिपोर्ट दुर्भावना से की गई हो या किन्हीं सदस्यों के भाषणों को जानबूझकर गलत रूप दिया गया हो या छिपाया गया हो तो वह विशेषाधिकार भंग करना और सदन की अवमानना करना होगा और दोषी व्यक्ति को दंड दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त, प्रेस पर रोक लगाई गई हैं कि वह किसी संसदीय समिति की कार्यवाही या उसके समक्ष दिए गए साक्ष्य या सके समक्ष प्रस्तुत किए गए किसी दस्तावेज का कोई अंश तब तक प्रकाशित नहीं करेगा जब तक वह कार्यवाही या साक्ष्य या दस्तावेज सदन में पेश न किया जाए। प्रेस पर यह भी रोक है कि वह सदन की किसी गुप्त बैठक की कार्यवाहियां या निर्णय तब तक प्रकट नहीं कर सकता जब तक कि सदन द्वारा उनकी गोपनीयता पर लगी रोक हटाई नहीं जाती। ऐसे प्रकाशन या प्रकटीकरण को सदन के विशेषाधिकार का घोर भंग माना जाता है। इसी प्रकार, वाद-विवाद के ऐसे अंशों को प्रकाशित करना जिन्हें अध्यक्ष के आदेश से सदन के कार्यवाही-वृत्तांत से निकाल दिया गया हो, विशेषाधिकार भंग करना और सदन की अवमानना करना है और तदनुसार दंडनीय है। 


यह प्रश्न प्रायः उठाया जाता है कि जो लेखक, वक्ता या व्यंग्य-चित्रकार विधानमंडलों की कमियों की सही आलोचना करता है, क्या उसके विरुद्ध कार्यवाही करने के मामले में भी विधानमंडलों के विशेषाधिकार अंतर्ग्रस्त होते हैं। निःसंदेह संसद को या किसी विधानमंडल को किसी ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण लेख, भाषण इत्यादि के विरुद्ध जिसके द्वारा उसके कार्यकरण पर या उसके सदस्यों या समितियों के कार्यकरण पर आक्षेप किया गया हो, कार्यवाही करने का अधिकार है। परंतु यदि आलोचना न्यायोचित और सद्भावनापूर्ण हो तो कोई कार्यवाही नहीं की जाती। 


लोक सभा द्वारा विशेषाधिकार के मामलों में सामान्य रूप से वही रुख अपनाया जाता है जो हाउस आफ कामंस का रहता है। 


हाउस आफ कामंस की संसदीय विशेषाधिकार संबंधी प्रवर समिति, 1967 ने निम्नलिखित सिफारिशें की थीं


“हाउस को अपने दांडिक अधिकार क्षेत्र का प्रयोग (क) किसी भी स्थिति में यथासंभव कम से कम करना चाहिए, (ख) तभी करना चाहिए जब वह संतुष्ट हो जाए कि ऐसा करना आवश्यक है जिससे कि हाउस को, उसके सदस्यों को या उसके अधिकारियों को ऐसी अनुचित रुकावट से या रुकावट डालने के प्रयास से या रुकावट डालने की धमकी से, जिससे उनके अपने अपने कृत्यों के पालन में काफी हस्तक्षेप हो रहा हो या होने की संभावना हो, युक्तियुक्त संरक्षण मिल सके। 


उसके बाद, हाउस आफ कामंस की विशेषाधिकार समिति ने अपने नी प्रतिवेदन (1976-77) में उक्त सिफारिश को दोहराया और हाउस आफ कायम उसे 6 फरवरी, 1978 को स्वीकार किया। 


दूसरी लोक सभा की विशेषाधिकार समिति ने अपने तेरहवें प्रतिवेदन में अन्ना बातों के साथ-साथ यह टिप्पणी की थी :


"कोई भी प्रेस को या किसी नागरिक को न्यायोचित टिप्पणी करने के अधिका से वंचित नहीं करेगा। परंतु यदि टिप्पणियों में संसद के सदस्यों के आचा के कारण उनकी व्यक्तिगत रूप से आलोचना की गई हो या यदि टिप्पणियों की भाषा अशिष्ट या अपमानजनक हो तो उन्हें न्यायोचित टिप्पणियां या आलोचना नहीं माना जा सकता। प्रेस आयोग (1954) का भी यह विचा था कि 'अशिष्ट या अपमानजनक भाषा में की गई टिप्पणी अनुचित है। गैर-जिम्मेदाराना सनसनीवाद भी न्यायोचित टिप्पणी की परिभाषा में न आता।" 


छठी लोक सभा की विशेषाधिकार समिति ने अपने चौथे प्रतिवेदन में यह विचार व्यक्त किया था"


समिति जानती है कि प्रेस की स्वतंत्रता वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्रा के मूल अधिकार का अभिन्न अंग है जिसकी गारंटी संविधान के अनुच्छेद 19 (1 (क) के अधीन सभी नागरिकों को दी गई है। समिति इस बात को महत्वपूर्ण मानत है कि संसदीय प्रणाली में संसद की कार्यवाहियों की न्यायोचित ढंग से और वफादा से प्रकाशित करने की प्रेस की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। परंतु यदि प्रेस की स्वतंत्रता का प्रयोग दुर्भावना से किया जाता है तो संसद का कर्तव्य हो जाता है कि वह ऐने मामलों में हस्तक्षेप करे। इसके साथ ही समिति का विचार है कि संसदीय विशेषाधिकार के कारण विचारों की निर्बाध अभिव्यक्ति या न्यायोचित टिप्पणी में कोई रुकावट नहीं आनी चाहिए या उसे निरुत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। 


सातवीं लोक सभा की विशेषाधिकार समिति ने अपने प्रथप प्रतिवेदन में अन्य बातों के साथ-साथ यह विचार व्यक्त किए :


“समिति का विचार है कि यदि लोकतंत्रात्मक प्रणाली में शक्ति का प्रयोग  संयम से किया जाए तो उससे सभी की गरिमा बढ़ती है; जितना शक्तिशाली कोई निकाय या संस्था हो उतने ही अधिक संयम की विशेषकर अपने दांडिक अधिकारों के प्रयोग में, उससे अपेक्षा की जाती है।" 


विशेषाधिकारों को संहिताबद्ध करना : 


संविधान के अनुच्छेद निर्धारित है कि संविधान में उल्लिखित विशेषाधिकारों के अलावा, संसद विधि द्वार अपने विशेषाधिकारों की, समय समय पर, परिभाषा कर सकती है, परंतु इस उपबन्केध अनुसरण में, प्रत्येक सदन की और उसके सदस्यों और समितियों की शक्तियों, विशेषाधिकारों, और उन्मुक्तियों की परिभाषा करने के लिए संसद द्वारा अब तक कोई विधि नहीं बनाई गई है। वास्तव में, संसद का एक महत्वपूर्ण विशेषाधिकार का है कि विशेषाधिकारों को संहिताबद्ध न किया जाए। वे वैसे ही अपरिभाषित रहने चाहिए जैसे कि आज हैं और जैसे कि वे सदा रहे हैं। 


जहां तक इस संवैधानिक उपबंध का, अर्थात “जब तक संसद द्वारा, विधि द्वारा परिभाषित न किए जाएं" और संसदीय विशेषाधिकारों की परिभाषा करने या उन्हें संहिताबद्ध करने के प्रश्न का संबंध है, इस बारे में मतभेद हैं। 


इस विषय पर विधान बनाने का प्रश्न भी 1921 से भारत में संसद राज्यों लोगों का सदा यही विचार रहा है कि उन्हें संहिताबद्ध करने से संसद/राज्य विधानमंडलों की प्रतिष्ठा और प्रभुसत्ता को हानि पहुंचने की ज्यादा संभावना है और प्रेस को उससे कोई लाभ नहीं मिलेगा। वर्तमान परिस्थितियों में संसदीय विशेषाधिकारों को संहिताबद्ध अपने क्षेत्रों में सर्वोच्च हैं। संसद अपने क्षेत्र में सर्वोच्च है और न्यायपालिका अपने करना न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय। विधानमंडल और न्यायपालिका अपने क्षेत्र में। जो मामले न्यायालयों के समक्ष आते हैं उनमें विधि की व्याख्या करना न्यायपालिका का काम है। इस संबंध में एम. हिदायतुल्ला, भारत के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश और राज्यसभा के भूतपूर्व सभापति का, यह कथन स्मरण कराए जाने तथा योग्य है :


"यदि संसद और न्यायालय एक-दूसरे के प्रति विश्वास और सम्मान की भावना रखते हैं तो विशेषाधिकारों के विषय पर विधि को संहिताबद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं रहती। संहिताबद्ध विधि से उन लोगों को अधिक लाभ होगा जो संसद, उसके सदस्यों और समितियों को बदनाम करने पर तुले होते हैं और न्यायालयों को अधिकाधिक मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए कहा जाएगा। आज जो स्थिति है उसमें अगर दोनों तरफ उचित सूझबूझ हो तो अधिक संभावना यही है कि संसदीय विशेषाधिकार भंग करने और उसकी अवमानना करने के मामलों में दंड देने के संसदीय अधिकार को न्यायालयों का समर्थन मिलेगा न कि इसके विपरीत रुख अपनाया जाएगा। लिखित रूप में विधि होने से संसद के लिए तथा न्यायालयों के लिए वह गरिमा बनाए रखना कठिन होगा जो वैध रूप से संसद की है और जिसे न्यायालय सदा उत्साहपूर्वक वैसे ही बनाए रखेंगे जैसे कि वे अपनी गरिमा बनाए रखते हैं"। 

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