प्रत्येक नए सदन का अपना स्वरूप होता है, परंतु शिष्टाचार के कुछ ऐसे नियम और प्रथाएं हैं जो प्रत्येक सदन के लिए समान होती हैं। विधानमंडल एक क्लब मात्र नहीं होता। अतः उसके सदस्यों के आचरण में उच्च स्तर की गरिमा, शालीनता, परस्पर सम्मान की भावना और भद्रता के गुण होने चाहिए जो उस स्थान के अनुकूल हों जहां राजनीतिक व्यवस्था की स्पर्धी शक्तियां संगठित होकर पारस्परिक प्रभाव के लिए आमने-सामने आती हैं। सदन में कार्य व्यवस्थित ढंग से, निर्बाध रूप से और कुशलतापूर्वक निबटाया जाए और विविध विचारधाराओं को महत्व मिले, इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए समाज के सर्वोच्च विचार-विमर्शी मंच के वातावरण का गंभीर एवं गरिमापूर्ण होना अनिवार्य है। सदन से बाहर भी सदस्यों से आशा की जाती है कि वे अपने पद की गरिमा के अनुकूल आचरण का स्तर बनाए रखेंगे। संसद के दिन-प्रतिदिन के कार्यकरण में सदस्यों द्वारा निजी व्यवहार में शिष्टाचार संबंधी कुछ नियमों का पालन करना केवल इसलिए बहुत महत्वपूर्ण नहीं होता कि सदन का कार्य निर्बाध रूप से और शिष्टता से चलता रहे बल्कि इसलिए भी कि संसद और इसके सदस्यों की गरिमा बनी रहे। ये नियम दोनों सदनों के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन नियमों पर आधारित हैं और प्रथाओं तथा पीठासीन अधिकारियों द्वारा समय समय पर दिए गए विनिर्णयों से धीरे धीरे इनका विकास हुआ है।'
सदन में व्यवहार
जब बैठक आरंभ होती है :
जब सदन का अधिवेशन चल रहा हो तो सदन के प्रति सदस्यों के व्यवहार का पहला नियम, जिसका उन्हें पालन करना चाहिए, यह है कि बैठक प्रारंभ होने के लिए जो समय निर्धारित हो उससे और मध्याह्न भोजन के पश्चात उसके पुनः समवेत होने के समय से कुछ मिनट पूर्व वे अपने स्थान ग्रहण कर लें। उसके उपरांत जंब मार्शल अध्यक्ष के आगमन की घोषणा करता है और अध्यक्ष लोक सभा चेंबर में प्रवेश करता है तो सदस्यों को आपस में बातचीत बंद कर देनी चाहिए और अपने अपने स्थानों पर खड़े हो जाना चाहिए और अध्यक्ष स्वयं जब सदन के दोनों ओर नमन करता है तो सदस्यों को भी अध्यक्ष पीठ के समक्ष नमन करना चाहिए, जो सदस्य उसी समय सदन में प्रवेश करें, उन्हें तब तक मार्ग में खामोशी से खड़े रहना चाहिए जब तक अध्यक्ष अपना स्थान ग्रहण न कर ले। ऐसा सदन के प्रति और अध्यक्ष-पीठ के प्रति सम्मानस्वरूप किया जाता है।
जब सदन की बैठक आरंभ हो जाए तो प्रत्येक सदस्य को मर्यादा से और ऐसे ढंग से लोक सभा चेंबर में प्रवेश करना और वहां से प्रस्थान करना चाहिए कि उससे सदन की कार्यवाही में बाधा न आए। लोक सभा चेंबर में प्रवेश करते समय, वहां से प्रस्थान करते समय और अपना स्थान ग्रहण करते समय और उसे छोड़ते समय सदस्य को अध्यक्ष पीठ के समक्ष नमन करना चाहिए। यह सम्मान समूचे सदन के प्रति होता है न कि अध्यक्ष-पीठ पर आसीन व्यक्ति के लिए। सदन से बाहर सभी निकायों एवं प्राधिकारियों के लिए अध्यक्ष सदन का प्रतिनिधित्व करता है। सदन के सामूहिक स्वरूप के प्रतीक के रूप में अध्यक्ष-पीठ के प्राधिकार का सम्मान करना संसदीय आचरण का मूल सिद्धांत है।
बोलते समय आचरण :
एक प्रमुख सिद्धांत यह है कि एक समय में केवल एक सदस्य को बोलना चाहिए या प्रश्न पूछने चाहिए और पीठासीन अधिकारी को यह अधिकार है कि वह सदस्यों को एक एक करके बोलने के लिए पुकार सकता है। जब कोई सदस्य बोलना चाहे तो उसे पीठासीन अधिकारी का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपने स्थान पर खड़े हो जाना चाहिए। पीठासीन अधिकारी का ध्यान आकर्षित करने के लिए हाथ हिलाना साधारण संसदीय प्रथा नहीं मानी जाती। किसी भी सदस्य को तब तक नहीं बोलना चाहिए जब तक वह पीठासीन अधिकारी का ध्यान आकर्षित नहीं कर लेता और पीठासीन अधिकारी उसे बोलने के लिए नहीं कहता। और, जब खड़े हुए सदस्यों में किसी एक को अध्यक्ष बोलने की अनुमति दे दे तो अन्य सबको तुरंत बैठ जाना चाहिए।'
किसी सदस्य को बोलने के अपने अधिकार का प्रयोग सदन के कार्य में बाधा डालने के लिए नहीं करना चाहिए। सदस्यों द्वारा आपस में तर्क-वितर्क करने या किसी अन्य सदस्य के भाषण पर या मंत्री के वक्तव्य पर बराबर टिप्पणियां करते रहने की अध्यक्ष द्वारा निंदा की गई है। जब कोई सदस्य सदन में बोल रहा हो और कोई अन्य सदस्य वाद-विवाद के दौरान पीठासीन अधिकारी की अनुमति से औचित्य का प्रश्न उठाने के लिए या वैयक्तिक स्पष्टीकरण के लिए खड़ा हो जाए तो भाषण करने वाले सदस्य को अपना स्थान ग्रहण कर लेना चाहिए।
यदि कोई सदस्य सदन के समक्ष किसी मामले पर टिप्पणी करना चाहता हो या भाषण दे रहे किसी अन्य सदस्य से, सदन के विचाराधीन किसी मामले के बारे में, स्पष्टीकरण के लिए या किसी व्याख्या के प्रयोजन से, प्रश्न पूछना चाहता है। तो उसे पीठासीन अधिकारी के माध्यम से प्रश्न पूछना चाहिए। सदस्य का अपने नियत स्थान से और खड़े होकर बोलना चाहिए। परंतु यदि कोई सदस्य रोग या दुर्बलता के कारण असमर्थ हो तो उसे अध्यक्ष द्वारा बैठकर बोलने की अनुमति दी जाती है।
किसी सदस्य को बोलते समय सदन के सदस्यों को व्यक्तिगत रूप से संबोधित न करके सदा पीठासीन अधिकारी को संबोधित करना चाहिए और पीठासीन अधिकारी के माध्यम से ही अन्य सदस्यों से कुछ कहना चाहिए। यह सिद्धात मात्र एक, औपचारिकता प्रतीत हो सकती है परंतु इसका सख्ती से पालन किया जाता है ताकि वाद-विवाद सदस्यों के बीच वार्तालाप का रूप न ले ले। यह निर्णय दिया गया है। कि सदस्य एक-दूसरे को ऐसे संबोधित करें जैसाकि वे किसी तीसरे व्यक्ति की बात कर रहे हों। इसी प्रकार मंत्रियों का उल्लेख उनके नामों से न करके सरकारी पदनामों से किया जाना होता है।
यदि पीठासीन अधिकारी ऐसा महसूस करे कि कोई सदस्य निरंतर असंगत बातें कह रहा है या अपने तर्कों को अथवा उससे पहले बोल चुके किसी सदस्य द्वारा दिए गए तर्कों को अनुचित ढंग से दोहराता जा रहा है तो वह सदस्य को अपना भाषण वहीं समाप्त करने के लिए निर्देश दे सकता है। सदस्यों को अपने तर्क दोहराने नहीं चाहिए, सिवाय उस स्थिति के जबकि किसी बात पर जोर देने के लिए ऐसा करना नितांत आवश्यक हो ! यदि कोई सदस्य पीठासीन अधिकारी के कहने की परवाह न करते हुए भाषण जारी रखता है तो वह निर्देश दे सकता है कि उस सदस्य के कथन कार्यवाही-वृत्तांत में सम्मिलित नहीं किए जाएंगे।
सदस्य अपने भाषणों में न्यायालयों के विचाराधीन किन्हीं मामलों का उल्लेख नहीं कर सकते। परंतु यह नियम विशेषाधिकार के मामलों पर, या जहां सदन के अपने सदस्यों के संबंध में सदन के अनुशासनात्मक अधिकार क्षेत्र का प्रश्न हो वहां लागू नहीं होता। ऐसे मामलों में, पीठासीन अधिकारी और सदन द्वारा प्रत्येक मामले पर उसके गुणावगुणों के आधार पर विचार किया जाता है। किसी भी सदस्य से यह आशा नहीं की जाती है कि वह संसद के दोनों सदनों में किसी भी सदन के आचरण या उसकी कार्यवाही के बारे में या किसी राज्य के विधानमंडल के आचरण या उसकी कार्यवाही के बारे में आपत्तिजनक पदावलियों का प्रयोग करे। सदस्य सदन के किसी फैसले पर, ऐसे फैसले को रद्द करने के किसी प्रस्ताव को छोड़कर, आक्षेप नहीं कर सकते। किसी सदस्य को किसी अन्य सदस्य या मंत्री के विरुद्ध मानहानिकारक या अपराधारोपक स्वरूप का लांछन लगाने की दृष्टि से उसका वैयक्तिक रूप से उल्लेख नहीं करना चाहिए या उसकी सद्भावना पर आपत्ति नहीं करनी चाहिए। सदस्यों को सरकारी अधिकारियों का नाम लेकर उनका उल्लेख नहीं करना चाहिए क्योंकि वे अपनी रक्षा में कुछ कहने के लिए वहां उपस्थित नहीं होते। सदस्यों को उच्च प्राधिकार वाले व्यक्तियों पर आरोप नहीं लगाने चाहिए या उन पर आक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक कि चर्चा उचित रूप से रखे गए मूल प्रस्ताव पर आधारित न हो।
सदस्यों को संसदीय भाषा का प्रयोग करना चाहिए और जो शब्द और पदावलियां वे प्रयोग करें वे देशद्रोहात्मक, राजद्रोहात्मक या मानहानिकारक कदापि नहीं होनी चाहिए। यद्यपि सरकार की आलोचना करने पर कोई रोक नहीं, फिर भी सदस्यों को इस अधिकार का प्रयोग सदन के कार्य में रुकावट डालने के लिए नहीं करना चाहिए। ।
सदस्यों को आपत्तिजनक या अध्यक्ष-पीठ पर लांछन लगाने वाली पदावलियों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। औचित्य, शिष्टता या शालीनता की मांग है कि सदस्य बोलते समय व्यंग्यपूर्ण, अपमानजनक या अनुचित शब्दों या पदावलियों का प्रयोग न करें। यदि कोई शब्द और वाक्यांश मानहानिकारक, अशिष्ट, असंसदीय या अभद्र हों तो पीठासीन अधिकारी उन्हें वृत्तांत से निकालने के आदेश दे सकता है।
कोई भी सदस्य सदन में, अपने प्रथम भाषण के सिवाय, अन्यथा लिखा हुआ भाषण नहीं पढ़ सकता। यद्यपि वह अपनी लिखी हुई टिप्पणियां देखकर अपनी याद ताजा कर सकता है। इसके अतिरिक्त, जब सदस्य को आंकड़े अथवा उद्धरण पेश करने हों तो वह अपनी टिप्पणियों से पढ़ सकता है। लिखित भाषणों के विरुद्ध इस नियम का उद्देश्य यह है कि वाद-विवाद का रुचिकर रूप बना रहे। वाद-विवाद ऐसी चर्चा होती है जिससे विचारों का विचारों से और तर्कों का तर्कों से संघर्ष होता है। पहले से तैयार किए गए निश्चित भाषणों का उन बातों से संबंध नहीं होता जो सदन में पहले कही गई हों। यदि हम चाहते हैं कि वाद-विवाद सजीव हो जिसमें बातों को दोहराया न जाए और तर्क केवल विचाराधीन मुद्दों तक ही सीमित रहें तो यह आवश्यक हो जाता है कि लिखित भाषणों पर रोक लगे। परंतु यह बात मंत्रियों पर लागू नहीं होती जो लिखित पाठ से नीति संबंधी वक्तव्य पढ़ सकते हैं और, जब आवश्यक समझें, तैयार किए गए भाषण भी पढ़ सकते हैं।
जब कोई सदस्य बोल रहा हो :
वाद-विवाद प्रभावपूर्ण हो इसके लिए भाषण सुनने वालों का आचरण उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना कि भाषण करने वालों का और इसलिए इस बारे में भी नियम हैं।
विरोधी दृष्टिकोण के प्रति सहनशील होना संसदीय शिष्टाचार का आधार है। विषयों पर चर्चा करता है जो आमतौर पर जटिल और कभी कभी विवादास्पद होते हैं। ऐसा न तो स्वाभाविक ही होगा और न वांछनीय कि उन पर असहमति न हो। अतः यह आवश्यक है कि विचार-विमर्श परस्पर आदान-प्रदान की भावना से प्रेरित हों। जब कोई सदस्य बोल रहा हो तो किसी अन्य सदस्य को अव्यवस्थित ढंग से उसमें संतबर्बाधा नहीं डालनी चाहिए। हाजिरजवाबी वाली या अन्यथा संगत टिप्पणियों का प्रायः बुरा नहीं माना जाता। किसी बात को स्पष्ट करने या अध्यक्ष के माध्यम से जानकारी लेने, किती भाषण को समझने या किसी वक्तव्य को मीठे ढंग से चुनौती देने की कभी-कभी होने वाली अंतर्बाधाएं तो ठीक हैं परंतु बार बार की जाने वाली अंतर्बाधाओं से बोलने वाले सदस्य के तर्क की शृंखला टूट जाती है और उनसे कार्यवाही में अव्यवस्था आ जाती है। इसके अतिरिक्त, बार बार प्रश्न पूछकर अंतर्बाधाएं करना संसदीय प्रथा नहीं है और ऐसी अंतर्बाधाओं की अध्यक्ष-पीट द्वारा निंदा की गई है। निरंतर अंतर्बाधाएं कार्यवाही में बिगाड़ पैदा करती हैं और संपूर्ण सदन की गरिमा समाप्त करती हैं। यदि बोलने वाला सदस्य पसंद नहीं करता तो उसके भाषण में बाधा नहीं डालनी चाहिए। उसके भाषण के बारे में कोई भी मुद्दा उसके भाषण समाप्त करने के पश्चात उठाया जा सकता है। सदस्यों को लोक सभा चेंबर में साधारणतया एक-दूसरे से बातें नहीं करनी चाहिए, परंतु यदि ऐसा आवश्यक हो जाए तो बहुत धीमी आवाज से ऐसा कर सकते हैं जिससे कि सदन की कार्यवाही में बाधा न हो। किसी सदस्य को कोई ऐसी पुस्तक, समाचारपत्र या पत्र नहीं पढ़ना चाहिए जिसका सदन की कार्यवाही से संबंध न हो या जो सदन की कार्यवाही के लिए आवश्यक न हो।" किसी सदस्य को अध्यक्ष-पीठ की ओर पीठ करके न तो खड़ा होना चाहिए न बैठना चाहिए। किसी सदस्य को अध्यक्ष-पीठ और ऐसे सदस्य के बीच से, जो भाषण दे रहा हो, नहीं गुजरना चाहिए। इस नियम को भंग करने पर अध्यक्ष-पीठ द्वारा कड़ी आपत्ति की जाती है।
हर समय केवल अपनी ही आवाज सुनते रहने का आकर्षण बड़ा प्रबल होता है परंतु एक अच्छा सांसद दूसरों की आवाज भी अवश्य सुनता है और जब स्वयं न बोल रहा हो तो उसे सदन में चुप बैठे रहना चाहिए।
दर्शक और गैलरियां:
\दर्शक गैलरी में बैठे अजनबियों का सदन में उल्लेख करना नियम-विरुद्ध ठहराया गया है। परंतु, समुचित मामलों में, अध्यक्ष-पीठ द्वारा सदन के विशेष बाक्स में विशिष्ट विदेशी मेहमान दर्शकों की उपस्थिति का उल्लेख किया जा सकता है और ऐसे अवसरों पर सदस्य अपनी मेज थपथपाकर उन विशिष्ट मेहमानों का अभिवादन कर सकते हैं। परंतु, साधारणतया, उस समय करतल ध्वनि नहीं करनी चाहिए जब कोई विशिष्ट मेहमान किसी गैलरी में या विशेष बाक्स में प्रवेश करता है। सदन में किसी सदस्य को प्रेस में अपने प्रचार की दृष्टि से नहीं बोलना चाहिए और न ही इसी दृष्टि से किसी बात का उल्लेख या अपील करनी चाहिए।"
सदन में सामान्य आचरण :
संसद के परिसरों में भूख हड़ताल फरने, धरना देने, या किसी प्रकार का प्रदर्शन करने या कोई धार्मिक कार्य करने की अनुमति नहीं है। इसके अतिरिक्त, संसदीय प्रथाओं के अनुसार सदस्य सदन में शस्त्र नहीं ला सकगे; कोट कंधे पर लटकाकर लोक सभा चेंबर में प्रवेश नहीं कर सकते; अपनी टोपियां, कोर, जैकेट, या शालें सदन में डेस्को पर नहीं रख सकते; लोक सभा चेंबर मैं ही नहीं ला सकते जब तक कि वृन्दावस्था होने या शारीरिक दुर्बलता जैमी विशेष परिस्थितियों में उन्हें साथ रखने की अनुमति न दी गई हो; लोक सभा चेंबर में धूम्रपान नहीं कर सकते, सदन में कोई नारे नहीं लगा सकते या उद्गार व्यक्त करने वाले विशेष शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकते; या इसी प्रकार का कोई ऐसा अन्य काम न कर सकते; सदन में अपने स्थानों पर ध्वज या प्रतीक नहीं लगा सकते; सदन अंदर टेप-रिकार्डर नहीं ला सकते या उसे चला नहीं सकते; मार्ग में खड़े होकर अन्य सदस्यों से बात नहीं कर सकते; वाद-विवाद के दौरान कोई साक्ष्य वस्तु नहीं ला सकते या सदन में प्रदर्शन नहीं कर सकते; संसद भवन के परिसरों में कोई साहित्य, प्रश्नावली या इश्तहार आदि वितरित नहीं कर सकते जब तक कि पहले से लिखित में अनुमति न ले ली गई हो; और वाद-विवाद के दौरान कोई हल्की-फुल्की हरकत नहीं कर सकते या ऐसा मजाक नहीं कर सकते जिसमें कटाक्ष का तत्व हो। सदस्यों को स्वयं अध्यक्ष-पीठ के पास नहीं जाना चाहिए, यदि आवश्यक हो तो उन्हें पटल अधिकारियों के पास चिट भेजनी चाहिए। इसके अलावा, सदस्यों को भाषण करने के तुरंत पश्चात लोक सभा चेंबर से बाहर नहीं चले जाना चाहिए। ऐसा करना शिष्ट संसदीय आचरण नहीं है। प्रत्येक सदस्य को अपने भाषण पर अन्य सदस्यों की जो टिप्पणियां हों उन्हें भी सुनना चाहिए, विशेष रूप से, जब कोई सदस्य किसी अन्य सदस्य की या मंत्री की आलोचना करता है तो उस सदस्य या मंत्री को यह आशा करने का अधिकार है कि आलोचक उसका उत्तर सुनने के लिए सदन में उपस्थित रहे। जब वह सदस्य या मंत्री आलोचक की बातों का उत्तर दे रहा हो तो उस समय आलोचक का सदन में न उपस्थित होना संसदीय शिष्टाचार का उल्लंघन है।
सदन की मर्यादा एवं गरिमा रखने के लिए सदस्यों से अपेक्षित है कि वे कोई छिछोरी बात न करें। महिला सदस्यों से आशा की जाती है कि वे सदन में बुनाई जैसे कोई काम न करें।
अध्यक्ष के खड़े होने पर प्रक्रिया :
जब कभी अध्यक्ष सदन को संबोधित करने के लिए खड़ा होता है तो सदस्यों के लिए यह अनिवार्य है कि वह उसे शांतिपूर्वक सुनें और किसी भी सदस्य को जो उस समय बोल रहा हो या बोलने वाला हो, अपना स्थान ग्रहण कर लेना चाहिए।" यह सुमान्य संसदीय प्रथा है कि जैसे ही अध्यक्ष बोलने के लिए खड़ा होता है या 'शांति', 'शांति' कहकर सदन को संबोधित करता है तो प्रत्येक सदस्य को अपना स्थान ग्रहण कर लेना चाहिए। जब अध्यक्ष सदन को संबोधित कर रहा हो तो सदस्यों को व्यवस्था का प्रश्न उठाने के लिए खड़ा नहीं होना चाहिए। जब अध्यक्ष खड़ा हो और सदन को संबोधित कर रहा हो तो किसी भी सदस्य को सदन में एक ओर से दूसरी ओर नहीं जाना चाहिए, खड़ा नहीं होना चाहिए, चलना नहीं चाहिए, लोक सभा चेंबर में प्रवेश नहीं करना चाहिए या लोक सभा चेंबर से प्रस्थान नहीं करना चाहिए।
किसी सदस्य का आर्थिक हित
जब किसी ऐसे मामले का निर्णय सदन द्वारा किया जाना हो जिसमें किसी सदस्य का वैयक्तिक, आर्थिक या प्रत्यक्ष हित है तो उस सदस्य से आशा की जाती है कि वह, उस मामले पर कार्यवाही में भाग लेते समय, अपने हित की घोषणा करे। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विचार-विमर्शों में निष्पक्षता रहे और ऐसा न हो कि वैयक्तिक, आर्थिक या प्रत्यक्ष के आधार पर उस सदस्य के मत पर आपत्ति की जाए। इसी प्रकार समिति के किसी सदस्य का किसी ऐसे मामले में ऐसा हित हो जिस पर समिति को विचार करना हो तो उस सदस्य को उस मामले में अपने हित के बारे में अध्यक्ष को बताना चाहिए।
मान्यताएं एवं प्रथाएं
सदस्यों द्वारा सदन में संसदीय शिष्टाचार के जिन नियमों का पालन करना होता है उनके अतिरिक्त बहुत-सी मान्यताएं एवं प्रथाएं हैं जो संसदीय जीवन में उचित स्तर बनाए रखने और सदन तथा इसके सदस्यों की गरिमा बनाए रखने के लिए समान महत्व रखती हैं। अतः संसद सदस्यों से आशा की जाती है कि वे सदन के अंदर ही नहीं सदन के बाहर भी आचरण का एक स्तर बनाए रखेंगे।" सदस्यों का आचरण प्रथा के प्रतिकूल या सदन की गरिमा के लिए अपमानजनक या किसी भी तरह उस स्तर के विपरीत नहीं होना चाहिए जिसकी संसद अपने सदस्यों से आशा रखती है।
"एक सदस्य का आचरण' शब्दों के व्यापक अर्थों की पूरी व्याख्या नहीं की गई है और प्रत्येक मामले में यह निर्धारण करना सदन के अधिकार क्षेत्र में है कि क्या किसी सदस्य का व्यवहार अनुचित रहा है या ऐसा व्यवहार रहा है जो संसद के सदस्य के लायक नहीं। अतः यद्यपि किसी विशेष मामले में ये तथ्य विशेषाधिकार भंग के या सदन की अवमानना के किसी मान्य शीर्षक के अंतर्गत न भी आएं तो भी सदन किसी सदस्य के आचरण को अनुचित और सदन की गरिमा के लिए अपमानजनक मान सकता है।
सदन को अपने सदस्यों के,सदाचार के लिए उन्हें दंड देने का अधिकार होता है। सदन अपने सदस्यों के आचरण की, चाहे वह आचरण सदन के भीतर हो या बाहर, छानबीन करने के अपने अधिकार का प्रयोग करता है। सदन को अपने सदस्यों के अव्यवस्थित आचरण लिए और अन्य अवमाननाओं के लिए, चाहे वे सदन के भीतर की गई हों या सदन की चारदीवारी से बाहर, उन्हें दंड देने की शक्ति भी प्राप्त है।
कुछ अधिक महत्वपूर्ण मान्यताएं एवं प्रथाएं इस प्रकार हैं :
(1) अध्यक्ष-पीठ द्वारा दिए गए विनिर्णयों की, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, सदन के भीतर या बाहर, आलोचना नहीं की जानी चाहिए। सदन की कार्यवाही का संचालन करने का प्राधिकार अध्यक्ष-पीठ को चूंकि सदन द्वारा स्वयं प्रदान किया गया है, अतः सदन के नियमों एवं प्रथाओं की अध्यक्ष-पीठ द्वारा की जानेवाली व्याख्या को मानना होता है, चाहे कोई सदस्य उससे कितना ही असंतुष्ट क्यों न हो या वह व्याख्या किसी सदस्य की व्यक्तिगत अभिरुचि के कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हो।
(2) अध्यक्ष के कक्ष में उसके साथ हुई किसी सदस्य की चर्चाओं का उस सदस्य द्वारा प्रेस में प्रचार नहीं किया जाना चाहिए।
(3) किसी सूचना का तब तक प्रचार नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि अध्यक्ष उसे गृहीत न कर ले और उसे सदस्यों को परिचालित न कर दिया जाए। किसी प्रश्न की सूचना का उस दिन तक कोई प्रचार नहीं किया जाना चाहिए जिस दिन सदन में प्रश्न का उत्तर दिया जाए।
(4) सदस्यों को विश्वास में लेकर दी गई या संसदीय समिति के सदस्य होने के नाते उन्हें दी गई जानकारी किसी को प्रकट नहीं की जानी चाहिए या उन सदस्यों द्वारा, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, अपने व्यवसाय में, जैसे संपादकों के रूप में या समाचारपत्रों के संवाददाताओं के रूप में या व्यापार फर्मों के मालिकों के रूप में उसका प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।
(5) सदस्यों को अपने निर्वाचकों की ओर से किन्हीं अपर्याप्त या निराधार तथ्यों के आधार पर या तथ्यों की सचाई का पता लगाए बिना कोई कार्यवाही नहीं करनी चाहिए और न ही उन्हें किसी व्यक्ति द्वारा की गई शिकायतों के समर्थक के रूप में अपना प्रयोग करने देना चाहिए। साधारणतया, विधायक को अपने निर्वाचकों की शिकायतों के बारे में पहले संबंधित मंत्री को लिखना चाहिए या उससे बात करनी चाहिए। यदि किसी शिकायत का स्वरूप सामान्य प्रकार का हो तो वह प्रश्नकाल में या किसी अन्य तरीके से सदन में उठा सकता है। परंतु, व्यक्तिगत मामले सदन के समक्ष नहीं लाए जा सकते। यदि विधायक सोचता है कि मामला न्यायोचित और वैध है परंतु साधारण तरीके से न्याय मिलने में विलंब हो जाएगा तो वह संबंधित अधिकारी या कर्मचारी से मिलकर मामला उसके ध्यान में ला सकता है, परंतु ऐसा मर्यादापूर्वक और ऐसे ढंग से किया जाना चाहिए कि उसमें दबाव डालने या अनुचित प्रभाव का प्रयोग करने की बात न हो।
(6) सदस्यों को ऐसे प्रमाणपत्र नहीं देने चाहिए जो तथ्यों पर आधारित हों, सरकार द्वारा उनको आवंटित रिहायशी स्थानों को आगे किराए पर देकर लाभ नहीं अर्जित करना चाहिए, या ऐसे मामलों में सरकारी अधिकारियों या मंत्रियों पर अनुचित प्रभाव नहीं डालना चाहिए जिनमें उनका प्रत्यक्ष या परोक्ष वित्तीय हित हो।
(7) कोई सदस्य जिस व्यक्ति या संगठन की ओर से कोई काम करने को इच्छुक हो उससे उस काम के बदले में किसी भी प्रकार का आतिश प्राप्त नहीं करना चाहिए।
(8) किसी सदस्य को अपने किसी संबंधी के लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए जिसमें वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हित रखता हो, नौकरी दिलाने के लिए या किसी काम के ठेके दिलाने के लिए सरकारी अधिकारियों को सिफारिशी पत्र नहीं लिखने चाहिए या अन्यथा उनसे नहीं कहना चाहिए।
(9) किसी सदस्य को किसी सरकारी कर्मचारी को प्रलोभन देकर उससे कोई ऐसी सरकारी जानकारी अनधिकृत रूप से प्राप्त नहीं करनी चाहिए जो अन्यथा उस कर्मचारी को अपने साधारण कृत्यों का पालन करते हुए नहीं देनी चाहिए, और न ही ऐसे व्यक्ति को सार्वजनिक महत्व के मामलों पर और नीति पर अपने वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध कुछ कहने के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए।
(10) किसी सदस्य को किसी ऐसे मामले में जिसमें कि वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वित्तीय हित रखता हो, सरकारी अधिकारियों या मंत्रियों पर रनुचित प्रभाव नहीं डालना चाहिए।
(11) किसी सदस्य को किसी ऐसी फर्म, कंपनी या संगठन के लिए जिसके साथ उसका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संबंध हो, सरकार से कारोबार प्राप्त करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
(12) किसी सदस्य को वकील के रूप में या कानूनी सलाहकार के रूप में या न्यायाभिकर्ता के रूप में किसी मंत्री के समक्ष या किसी ऐसे कार्यपालिका अधिकारी के समक्ष उपस्थित नहीं होना चाहिए जो अर्द्ध-न्यायिक शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो।
(13) सदस्य के रूप में अपने पद का कार्य-निष्पादन करते भ्रष्टाचार में लिप्त होने का उसका आचरण सदन द्वारा विशेषाधिकार भंग माना जाता है। अतः सदन में अथवा किसी समिति में प्रस्तुत किए गए अथवा प्रस्तुत किए जाने वाले किसी विधेयक, संकल्प अथवा मामले के पक्ष में बोलने अथवा उसका विरोध करने के लिए लाया गया कोई शुल्क, प्रतिकर अथवा प्रतिफल विशेषाधिकार भंग माना जाता है। यदि कोई सदरय किसी व्यक्ति से उसके किन्हीं दावों की सदन में वकालत करने के लिए प्रतिफल प्राप्त करने हेतु कोई समझौता करता है तो यह भी उस सदस्य का कदाचार अथवा उसके द्वारा विशेषाधिकार का भंग किया जाना माना जाता है।
दुर्भाग्यवश, पिछले कुछ समय से सदन के अंदर तथा बाहर दोनों जगह सदस्यों के आचरण तथा शिष्टाचार के स्तर में ह्रास होने की भावना जोर पकड़ती जा रही है। जब आए दिन, मछली बाजार के से दृश्यों के बाद तथा बिना कोई कार्य किए सदनों को स्थगित कर दिया जाए तब सोचना पड़ता है कि क्या ये संस्थाएं सरकारी खजाने से उन पर इतना ज्यादा व्यय किए जाने के बावजूद कहीं निस्सार और निरर्थक तो नहीं होती जा रहीं। यह भी देखने में आया है कि हमारे निर्वाचित प्रतिनिधियों में से बहुत-से प्रतिनिधि जनता के साथ अपने व्यक्तिगत आचरण, संबंध और व्यवहार में आचार-संहिता के आधारभूत प्रतिमानों का पालन नहीं करते। किसी लोकतंत्र में प्रतिनिधियों के सम्मान में हास से बड़ी अफसोस तथा चिंता की बात और क्या हो सकती है?
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