Thursday, March 17, 2022

संसद में सेवाओं की व्यवस्था और सचिवालय Provision of Services and Secretariat in Parliament

विधानमंडल द्वारा अनुमोदित नीतियों को कार्यरूप देने में या उनके प्रशासन में विधान मंडल का कोई दखल नहीं होता। फिर भी, लोगों के प्रतिनिधि निकाय के रूप में विधानमंडल उनकी प्रभुसत्ता का प्रतीक होता है। उसे लोगों के हितों का ध्यान रखना होता है और यह सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने होते हैं कि प्रशासन संविधान के दायरे में रह कर कार्य करे। 


यदि देश के विधानमंडल को और सदस्यों को बिना भय या पक्षपात के अपने अधिकारों का प्रयोग करना है और अपने दायित्वों का निर्वहन करना है तो उन्हें इतनी स्वतंत्रता अवश्य होनी चाहिए कि वे सरकार की त्रुटियों को प्रकाश में ला सकें जिससे सरकार की नीतियों की और उसके कार्य निष्पादन की सार्वजनिक रूप से छानबीन हो सके। विधानमंडल और विधायक इस कृत्य का निर्वहन प्रभावी रूप  से और योग्यता से तभी कर सकते हैं जब उनका अपना सचिवालय हो जो कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त हो। यदि संसदीय लोकतंत्र को लोगों के अधिकतम हित में काम करना है तो सचिवालय का स्वतंत्र होना आवश्यक है क्योंकि सदस्य विधानमंडल में ही सरकार की नीतियों को चुनौती देते हैं और उन पर चर्चा करते हैं और यह निर्णय सचिवालय की सहायता से पीठासीन अधिकारी ही करता है कि किसी प्रश्न या चर्चा को गृहीत किया जाए या नहीं। यदि पीठासीन अधिकारी के निर्णय कार्यपालिका के प्रभाव में आकर किए जाते हैं तो संसदीय लोकतंत्र का आधार ही खतरे में पड़ जाता है। 


भारतीय विधानमंडल के लिए सरकार से स्वतंत्र और असंबद्ध' पृथक सचिवालय का विचार जनवरी, 1926 में तब प्रभावी रूप से सामने आया जब विट्ठल भाई पटेल द्वारा आयोजित भारत में विधायी निकायों के पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में केंद्रीय विधानसभा के लिए पृथक कार्यालय स्थापित करने के लिए स्तुत किया गया एक संकल्प स्वीकृत हुआ। उसके बाद, 22 सितंबर, 1928 को तत्कालीन केंद्रीय विधानसभा में सुप्रसिद्ध नेता मोतीलाल नेहरू ने एक संकल्प पेश किया जिसका समर्थन एक अन्य प्रसिद्ध नेता लाला लाजपतराय ने किया और उस संकल्प का उद्देश्य पृथक सभा विभाग का गठन करना था। वह संकल्प स्वीकृत किया गया। वास्तव में वही संकल्प 'सभा विभाग के सृजन और उसके प्राधिकार का स्रोत' बना। उसके परिणामस्वरूप, गवर्नर-जनरल के विभाग में 10 जनवरी, 1929 को 'विधान सभा विभाग' नामक पृथक विभाग स्थापित किया गया और विधान सभा का 'प्रेजीडेंट' उसका वास्तविक प्रमुख बना। 


स्वतंत्रता के बाद की स्थिति 


26 जनवरी, 1950 तक उस विभाग का नाम वही रहा और उस दिन जब भारत का संविधान लागू हुआ और अस्थायी संसद बनी तो नाम बदलकर 'संसद सचिवालय' रख दिया गया। 1952 में नए संविधान के अधीन दो अलग अलग सदन कौंसिल आफ स्टेट्स (राज्य सभा) और हाउस आफ द पीपुल (लोक सभा) बन जाने के बाद भी हाउस आफ द पीपुल के सचिवालय का नाम संसद सचिवालय रहा, परंतु कौंसिल आफ स्टेट्स के लिए 'कौंसिल आफ स्टेट्स सचिवालय' नाम का नया सचिवालय स्थापित किया गया। उनके नाम 1954 में बदलकर हिंदी में क्रमशः लोक सभा सचिवालय और राज्य सभा सचिवालय रखे गए। 


संवैधानिक उपबंध 


दोनों सदनों के लिए पृथक और स्वतंत्र सचिवालय स्थापित करने का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना रहा है कि संसद के प्रति कार्यपालिका की जिम्मेदारी और प्रशासन के उत्तरदायित्व के सिद्धांतों का प्रभावी एवं पूर्ण प्रयोग हो। वास्तव में स्वयं भारत के संविधान में इस महत्वपूर्ण आवश्यकता को माना गया है। अनुच्छेद 74 और 75 में उपबंध है कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोक सभा के प्रति उत्तरदायी होगी और अनुच्छेद 98 के प्रथम खंड में उपबंध है कि प्रत्येक सदन के लिए पृथक अधिकारी और कर्मचारी होंगे और उसमें दोनों के साझे पदों के सृजन की भी अनुमति दी गई है। इस अनुच्छेद के खंड 2 द्वारा संसद को दोनों सदनों के सचिवालयों के कर्मचारियों की भर्ती और सेवा-शर्तों को विनियमित करने के लिए विधियां बनाने का प्राधिकार दिया गया है। खंड 3 में उपबंध किया गया है कि जब तक संसद द्वारा ऐसी विधियां नहीं बनाई जाती तब तक राष्ट्रपति संबंधित पीठासीन अधिकारियों का परामर्श लेने के पश्चात भर्ती और सेवा-शर्तों को विनियमित करने के लिए नियम बना सकता है। संविधान के अनुच्छेद 98 के खंड 2 के अधीन संसद ने अब तक कोई विधान पास नहीं किया है। परंतु पहली अक्तूबर, 1955 को अनुच्छेद 98 के खंड 3 के अनुसरण में, राष्ट्रपति द्वारा अध्यक्ष के परामर्श से लोक सभा सचिवालय (भर्ती तथा सेवा शत) नियम 1955 बनाए गए थे और प्रख्यापित किए गए थे। राष्ट्रपति द्वारा राज्य सभा सचिवालय के लिए ऐसे ही नियम 1957 में सभापति के परामर्श से बनाए गए थे और प्रख्यापित किए गए थे। 


पृथक भर्ती तथा सेवा-शर्ते 


संसद के सचिवालयों में नियुक्त लोगों की भर्ती और सेवा-शर्ते उपर्युक्त नियमों द्वारा विनियमित होती हैं। वे प्रतियोगी परीक्षाओं द्वारा अपने-अपने सचिवालय में भर्ती करते हैं। इस प्रकार, ये सचिवालय सभापति या अध्यक्ष के, जैसे भी स्थिति हो, मार्गदर्शन और नियंत्रण में स्वतंत्र सचिवालयों के रूप में कार्य करते हैं। सुस्थापित प्रयाओं के अनुसार, भारत सरकार द्वारा अपने मंत्रालयों और विभागों के लिए अधिकारियों तथा कर्मचारियों की सेवा-शर्तों से संबंधित आदेश स्वतः ही लोक सभा सचिवालय और राज्य सभा सचिवालय के अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर लागू नहीं हो जाते। ऐसे सभी सरकारी आदेशों की जांच की जाती है और यदि उन्हें उपयुक्त पाया जाए तो यह निर्णय किया जाता है, उनके उपबंध दोनों सचिवालयों के अधिकारियों और कर्मचारियों पर पूर्णतः लागू किए जाएं और उन्हें इस प्रकार अपनाए जाने के आदेश सरकार से परामर्श किए बिना, भर्ती तथा सेवा-शर्तों संबंधी आदेश के रूप में जारी किए जाते हैं। परंतु यदि किसी वित्तीय आदेश में कोई रूपभेद या परिवर्तन करना आवश्यक समझा जाए तो वित्त मंत्रालय से परामर्श करने के पश्चात उन्हें अपनाए जाने के आदेश जारी किए जाते हैं। यदि विधानमंडल सचिवालय के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को अपनी सेवा के भविष्य के लिए और पदोन्नतियों, वेतनमानों इत्यादि के लिए गृह मंत्रालय, वित्त मंत्रालय या सरकार के किसी अन्य विभाग पर निर्भर करना पड़ता तो स्पष्ट है कि वे कार्यपालिका के मुकाबले में स्वतंत्र नहीं रह सकते थे। 


संसद के दोनों सदनों का बजट 


संसद के सदस्यों और अधिकारियों के वेतन तथा भत्तों और उनको मिलने वाली सुविधाओं पर किए जाने वाले खर्च के मामले में भी स्वतंत्रता की स्थिति बनाए रखी गई है। ये खर्च भारत की संचित निधि में से किए जाते हैं। भारत सरकार के अन्य मंत्रालयों की तरह, राज्य सभा और लोक सभा के संबंध में अलग अनुदानों की मांगे संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखी जाती हैं। संसद प्रत्येक वर्ष विनियोग अधिनियमों के द्वारा उस खर्च की मंजूरी देता है। दोनों सदनों की और उनके सचिवालयों की मांगों पर सदन में कटौती प्रस्ताव पेश करने की अनुमति नहीं है। 


उदाहरणार्थ, लोक सभा के बजट अनुमान लोक सभा सचिवालय द्वारा संकलित किए जाते हैं और महासचिव के अनुमोदन के पश्चात अध्यक्ष द्वारा नियुक्त एक तदर्थ समिति के समक्ष रखे जाते हैं। उपाध्यक्ष और वित्तीय समितियों के सभापति स तदर्थ समिति के सदस्य होते हैं। उसके पश्चात समिति की सिफारिशों के साथ, यदि कोई हो तो, वे अनुमान केंद्रीय बजट में सम्मिलित करने के लिए वित्त मंत्रालय को प्रेषित किए जाते हैं। वित्त मंत्रालय की किसी विभागीय समिति द्वारा या संसद की किसी अन्य समिति द्वारा उनकी जांच नहीं की जाती। 


कृत्यात्मक आधार पर मोटे तौर पर कार्य का विभाजन 


सचिवालयों की स्वतंत्रता और कार्यकुशलता की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, लोक सभा के अध्यक्ष और राज्य सभा के सभापति ने, एक दूसरे से परामर्श करके, अगस्त, 1973 में संसद की एक समिति नियुक्त की थी जिसका उद्देश्य यह था कि वह विशेष रूप से भारत सरकार द्वारा नियुक्त तीसरे वेतन आयोग की, जिसने उसी वर्ष अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत कर दिया था, सिफारिशों के प्रकाश में, संसदीय अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतनमानों और सेवा की अन्य शर्तों के पुनरीक्षण के मामले में उन्हें परामर्श दे। अपने विचार-विमर्शों में, समिति ने दोनों सचिवालयों के स्वतंत्र स्वरूप को और इनके कृत्यों एवं उत्तरदायित्वों की विशिष्टता को ध्यान में रखा। समिति ने दोनों सचिवालयों को अधिक कार्यकुशल एवं मितव्ययी बनाने के लिए वैज्ञानिक आधार पर इनके पुनर्गठन की सिफारिश की। उसके परिणामस्वरूप, सचिवालयों का निम्नलिखित सेवाओं के रूप में कृत्यात्मक पुनर्गठन किया गया : 


(1) विधायी सेवा 


जो विधान, प्रश्नों, कार्यसूची तैयार करने आदि जैसे सदन से संबंधित कार्य करती है। 


(2) वित्तीय समिति सेवा 


जो तीन वित्तीय समितियों को और रेलवे अभिसमय समिति को सचिवालयी सहायता उपलब्ध कराती है और इनसे संबंधित सभी कार्य करती है; 


(3) एक्जीक्यूटिव तथा प्रशासन सेवा 


जो प्रशासनिक और सामान्य मामलों से संबंधित और सदस्यों तथा अधिकारियों और कर्मचारियों को वेतन तथा भत्तों की अदायगी और अन्य सुविधाओं से संबंधित कार्य करती है; 


(4) ग्रंथालय, संदर्भ, शोध, प्रलेखन तथा सूचना सेवा 


जो अद्यतन और पूरी तरह सुसज्जित ग्रंथालय तथा कुशल शोध एवं संदर्भ सेवाओं के द्वारा भारत में और विदेशों में प्रतिदिन घटने वाली घटनाओं से संसद सदस्यों को सुपरिचित रखती है और दोनों सदनों लोक सभा और राज्य सभा के समक्ष आने वाले विधायी उपायों एवं अन्य मामलों पर संदर्भ सामग्री उपलब्ध कराती है ताकि सदस्य अपने अपने सदन में होने वाले वादविवाद में प्रभावी रूप से भाग ले सकें 


(5) शब्दशः आशुलेखन (रिपोर्टिंग), वैयक्तिक सचिव तथा आशुलिपिक सेवा


जो संसदीय कार्यवाहियों और समितियों की कार्यवाहियों का आशुलेखन करती है और अधिकारियों के लिए आशुलिपिक सहायता की व्यवस्था करती है। 


(6) संसदीय भाषांतरकार सेवा 


जो लोक सभा की तथा इसकी समितियों की कार्यवाहियों के समानांतर अथवा साथ साथ अनुवाद के लिए उत्तरदायी है। 


(7) मुद्रण, प्रकाशन, लेखन-सामग्री, विक्रय, भंडार, वितरण सेवा 


जो (क) मुद्रण, रोटा प्रिंटिंग और जिल्द बांधने के कार्य, (ख) लेखन-सामग्री और भंडार, रिकार्ड रखने, (ग) विक्रय, और (घ) प्राप्ति तथा वितरण के कार्य करती है। 


(8) संपादकीय तथा अनुवाद सेवा 


जो वाद-विवाद का संपादन करती है और वाद-विवाद के सारांश तैयार करती है, वाद-विवाद, प्रतिवेदनों और संसदीय पत्रों का अनुवाद करती है; 


(9) सुरक्षा, द्वारपाल तथा सफाई सेवा 


जो संसद भवन के अंदर और बाहर सुरक्षा के उपायों की देख रेख करती है और परिसरों का उचित रख रखाव सुनिश्चित करती है; 


(10) क्लर्क, टाइपिस्ट, रिकार्ड सार्टर और दफ्तरी सेवा; और 


(11) संदेशवाहक सेवा 


जो अन्य सभी सेवाओं द्वारा अपेक्षित सहायक कर्मचारियों के रूप में कार्य करती है। 


इस प्रकार दोनों सचिवालयों का समूचा ढांचा कृत्यात्मक आधार का है जिसमें सेवी वर्ग और पर्यवेक्षण के स्तर कम-से-कम रखे गए हैं और कार्य का आयोजन, जहां कहीं संभव है, 'डेस्क आफिसर' प्रणाली पर आधारित है ताकि सचिवालयों में कार्य इकाइयां छोटी और ठोस हों और उत्तरदायित्व के अनावश्यक विस्तार के बिना कार्य शीघ्र और गुणवत्तापूर्ण हो।' 


वर्तमान में लोक सभा सचिवालय में 2000 से अधिक कर्मचारी हैं और राज्य सभा में लगभग 1000 । संसदीय सेवाओं से संबद्ध अन्य कर्मियों जैसे चिकित्सा केंद्र, अर्द्ध-सैनिक बल, लोक निर्माण विभाग, कैंटीन आदि को भी जोड़ लें तो संसद के सत्र के दौरान लगभग 5,600 तथा सत्रों के बीच के समय में लगभग 4,400 कर्मचारी संसद में कार्यरत रहते हैं। 


संसद ग्रंथालय तथा सूचना सेवा 


भारतीय संसद दावा कर सकती है कि इसके पास बहुत ही कुशल सूचना सेवा सहित एक उत्तम संसदीय पुस्तकालय है। कार्यात्मक दृष्टि से इसे संसद ग्रंथालय तथा संदर्भ अनुसंधान, प्रलेखन और सूचना सेवा कहा जाता है। इसका प्राथमिक उद्देश्य एक अद्यतन, तथा सुसज्जित पुस्तकालय और कुशल अनुसंधान तथा संदर्भ सेनाएं बनाए रखकर संसद सदस्यों को देश-विदेश के दैनिक घटनाक्रम की पूरी जानकारी उपलब्ध कराना है । 


इस समय इस पुस्तकालय में 10 लाख से अधिक पुस्तकें हैं। अंग्रेजी तथा भारतीय भाषाओं के लगभग 200 भारतीय तथा विदेशी समाचारपत्रों और 665 के करीब पत्र-पत्रिकाएं नियमित रूप से पुस्तकालय में आती हैं। इसके साथ दुर्लभ पुस्तकों, कला पुस्तकों आदि का विशाल संग्रह है। सबसे पुरानी छपी हुई पुस्तक 1871 की है। किंतु, पुस्तकालय की सर्वाधिक मूल्यवान धरोहर संविधान सभा द्वारा यथास्वीकृत तथा इसके सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित भारत के संविधान की हिंदी तथा अंग्रेजी में मूल सुलिखित प्रति है। 


समय समय पर विशिष्ट अवसरों पर, संसद ग्रंथालय रुचि के विषयों पर पुस्तक प्रदर्शनियों का आयोजन करता है। संदर्भ तथा प्रलेखन प्रभाग अन्य बातों के साथ साथ संसद सदस्यों से प्राप्त होने वाले संदर्भो का प्रतिपादन करने के लिए पूरी तरह से सुसज्जित है। 1970 में संदर्भ प्रभाग ने 700 संदर्भ प्राप्त तथा प्रतिपादित किए। इसकी तुलना में 1990 के दौरान इनकी संख्या बढ़कर 5,167 हो गई। 1995, 1996, 1997, 1998 और 1999 में इनकी क्रमशः संख्या 40302, 3891, 4194, 4487 और 3808 रही। 


अनुसंधान तथा सूचना प्रभाग संसद सदस्यों की सूचना संबंधी अपेक्षाओं का पहले से अनुमान लगा लेता है और उचित समय पर वस्तुनिष्ठ सूचना सामग्री जैसे विवरणिकाएं, सूचना बुलेटिन, पृष्ठभूमि टिप्पण, तथ्य-पत्र आदि जारी करके उन्हें विभिन्न राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्रों के वर्तमान घटनाक्रम से अवगत कराने का सतत प्रयास करता है। 


प्रेस तथा लोक संपर्क प्रभाग लोक सभा सचिवालय के प्रेस तथा लोक संपर्क से संबंधित सारे कार्य की देखभाल करता है, जिसमें मुख्य रूप से प्रेस, सरकारी प्रचार संगठनों और जन प्रचार माध्यमों (मीडिया) के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखना सम्मिलित होता है। यह लोक सभा की प्रेस दीर्घा से संबंधित सभी मामलों को भी देखता है, जिनमें विभिन्न संसदीय घटनाओं तथा कार्यकलापों के संबंध में प्रेस विज्ञप्तियां जारी करना शामिल है। 


सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुई समुन्नति के साथ चलने की दृष्टि से, संसद ग्रंथालय सूचना प्रणाली ने 1987 में कंप्यूटर केंद्र की स्थापना करके कंप्यूटरीकृत सूचना सेवा के क्षेत्र में एक शुरुआत की। संसद ग्रंथालय सूचना प्रणाली का डाटाबेस संसद सदस्यों, संसद के अधिकारियों, समितियों, अनुसंधान तथा संदर्भ कर्मिकों और अन्य कर्मचारियों की तात्कालिक संदर्भ आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अभिकल्पित किया गया है। कंप्यूटरों में संग्रहीत सूचना तथा तत्काल पुनःप्राप्ति के लिए उपलब्ध आधार-सामग्री में संसद के दोनों सदनों में प्रश्न-उत्तर तथा वाद-विवाद सदस्यों की सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि, संसदीय समितियों के संबंध में सूचना, अध्यक्ष के विषयसूचक संदर्भ, विधेयक, सदस्यों के जीवन-वृत्त, संविधान सभा के वाद-विवाद, के निर्णय तथा उसकी समुक्तियां आदि सम्मिलित हैं। इस प्रणाली के डाटाबेस में संसदीय कार्यकलापों से संबंधित आधार-सामग्री राज्य विधान मंडलों सम्मिलित कुछ के अनुरोध पर भी उपलब्ध की जाती है। कुछ राज्य विधानमंडलों ने अपने कंप्यूटर एन ई सी एस-1000 को मेरानल इंफार्मेटिक्स सेंटर नेटवर्क के माध्यम से जोड़कर संसद पुस्तकालय सूचना प्रणाली की कुछ आधार-सामग्री को प्राप्त करने की पहले से व्यवस्था कर ली है। संसदीय ग्रंथालय सूचना प्रणाली नेशनल इंफार्मटिक्स सेंटर नेटवर्क से जुड़ी हुई है और इस प्रणाली के अंतर्गत समूचे देश में जिला सूचना केंद्रों के साथ संवादों का आदान प्रदान किया जा सकता है। कुछ अंतर्राष्ट्रीय डाटाबेसों के साथ भी इसके सीधे संपर्क हैं। 


प्रलेखन सेवा का मुख्य कार्य पुस्तकालय में प्राप्त होने वाली तथा रखी जाने वाली सभी पुस्तकों, रिपोर्टों, पत्र-पत्रिकाओं, समाचारपत्रों की कतरनों और प्रलेखों को ठीक स्थान पर रखना, उनका संग्रह करना और उनका विषयगत वर्गीकरण अथवा सूचीकरण करना और तत्पश्च संसद सदस्यों को उनके दिन प्रतिदिन के संसदीय कार्य में प्रयोग के लिए संबंधित सामग्री के सारांश उपलब्ध कराना है। सभी प्रमुख विषयों के संबंध में प्रलेखन कार्ड तैयार किए जाते हैं तथा कार्ड सूची-दराजों में रखे जाते हैं और संसदीय पुस्तकालय सूचना प्रणाली के डाटाबेस में भी भरे जाते हैं। प्रलेखन अनुभाग एक पाक्षिक पत्रिका, पार्लियामेंटरी डाक्यूमेंटेशन भी निकालता है। 


संदर्भ तथा अनुसंधान कार्य के एक महत्वपूर्ण सहायता-साधन के रूप में यह सेवा अंग्रेजी तथा हिंदी दोनों भाषाओं के कुछ चुने हुए समाचारपत्रों की संपादकीय टिप्पणियों, लेखों तथा मुख्य समाचारों का एक व्यापक संग्रह भी रखती है। समाचारपत्रों की ये कतरनें कालानुक्रम में अलग फोल्डरों में रखी जाती हैं और सदस्य पुस्तकालय में इनका अध्ययन कर सकते हैं या इनकी सहायता ले सकते हैं। 


ग्रंथालय की नई इमारत : 


जैसे सभी पुस्तकालयों को स्थान की कमी का सामना करना पड़ता है, उसी तरह संसद ग्रंथालय के पास भी स्थान की अत्यधिक कमी थी। किंतु अब संसद ग्रंथालय अपनी अति आधुनिक और विशाल नई इमारत में आ गया है। इसकी आधारशिला 15 अगस्त, 1987 को रखी गई थी और तभी इसे 'संसदीय ज्ञानपीठ' नाम दिया गया था। 


संसदीय अध्ययन तथा प्रशिक्षण केंद्र 


संसदीय लोकतंत्र ने कुछ ऐसी उन्नत प्रक्रियाओं और कार्यपद्धतियों का विकास किया है जो न तो जल्दी ग्रहण की जा सकती हैं और न ही जल्दी समझी जा सकती हैं। इसलिए लोकतंत्रात्मक व्यवस्था के कार्यकरण में भिन्न भिन्न स्तरों पर काम करने वालों, जैसे नीति निर्माताओं, विधायकों, प्रशासकों और ऐसे ही विभिन्न अन्य कार्यकर्ताओं को संसदीय संस्थाओं के सिद्धांतों, साधनों और कार्य-पद्धतियों में प्रशिक्षण देना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, यह भी आवश्यक है कि उनके दृष्टिकोण को संसदीय लोकतंत्र की आवश्यकताओं एवं उत्तरदायित्वों तथा उसके वातावरण के अनुकूल बनाया जाए। यह सुनिश्चित करने का दायित्व भी मूलतः संसद का ही है कि आवश्यक अध्ययन किए जाते रहें और अपेक्षित प्रबोधन एवं प्रशिक्षण देने का कार्य भी किया जाता रहे। 


संसदीय अध्ययन तथा प्रशिक्षण केंद्र लोक सभा सचिवालय के एक प्रभाग के रूप में 1976 में स्थापित किया गया था। इसका उद्देश्य विधायकों और अधिकारियों को संसदीय संस्थाओं के विभिन्न विषयों, कार्य-पद्धतियों एवं प्रक्रियाओं में पैदा होने वाली समस्याओं की दृष्टि से अध्ययन और क्रमबद्ध प्रशिक्षण के संस्थागत अवसर उपलब्ध कराने की काफी समय से महसूस की जा रही आवश्यकता पूरी करना है। 


केंद्र के क्रियाकलाप इस प्रकार हैं : संसद सदस्यों और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों के लिए विचार गोष्ठियां और प्रबोधन कार्यक्रम आयोजित करना; संसद के सचिवालयों और राज्य विधानमंडलों के अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण तथा पुनश्चर्या पाठ्यक्रम आयोजित करना; भारत सरकार के वरिष्ठ और मध्यम स्तर के अधिकारियों और भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय विदेश सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और अनेक अन्य अखिल भारतीय तथा केंद्रीय सेवाओं के परिवीक्षाधीन अधिकारियों के लिए पुनश्चर्या पाठ्यक्रम आयोजित करना। देश भर के विश्वविद्यालयों के छात्रों के लिए माडल संसदें आयोजित करना और इस प्रयोजन के लिए विश्वविद्यालयों के अध्यापकों को प्रशिक्षण देना; राज्य विधानमंडलों के सदस्यों और प्रशासनिक अधिकारियों, छात्रों और अन्य व्यक्तियों के लिए अध्ययन दौरे आयोजित करना; और भारत तथा विदेशी संसदों के संसदीय तथा विधानमंडलों के अधिकारियों को संयोजित करना भी केंद्र के क्रियाकलापों में शामिल है। संसदीय अधिकारियों के लिए संसदीय इंटर्नशिप कार्यक्रम और अंतर्राष्ट्रीय विधायी प्रारूप पाठ्यक्रम (इंटरनेशनल लेजिस्लेटिव ड्राफ्टिंग) इस केंद्र के दो नवीनतम नियमित पाठ्यक्रम हैं जो मुख्यतया विदेशियों के लिए हैं। 


संसदीय संग्रहालय तथा अभिलेखागार 


भारत ने संसदीय संस्थाओं को हमेशा अधिकतम महत्व दिया है। पिछले कुछ समय से, इस क्षेत्र में देश की बहुमूल्य विरासत को वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए बचाने, उनका संग्रह करने और उनके संरक्षण के लिए सभी आवश्यक संसाधनों को प्रयोग में लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस क्षेत्र में शुरुआत वर्ष 1976 में की गई जब लोक सभा सचिवालय ने संसदीय संस्था के, इसके क्रियाकलापों के और इसकी महान विभूतियों के इतिहास का प्रामाणिक, विस्तृत, पूर्ण एवं अद्यतन चित्रीय रिकार्ड सुरक्षित रखने के लिए फोटो तथा फिल्मों का संसदीय अभिलेखागार स्थापित किया। संसदीय संग्रहालय तथा अभिलेखागार स्थापित करने के प्रस्ताव का अनुमोदन लोक सभा की सामान्य समिति ने पहली अगस्त, 1984 को किया। 


संसदीय संग्रहालय तथा अभिलेखागार का मूल उद्देश्य यह है कि संविधान तथा संसद से संबंधित वर्तमान काल के और भूतकाल के सभी बहुमूल्य अभिलेखों, ऐतिहासिक दस्तावेजों एवं वस्तुओं को, भावी पीढ़ियों के लिए, समय के साथ साथ और उपेक्षा के कारण नष्ट होने से बचाया जाए ताकि उनसे लोग संसदीय संस्थाओं तथा राजनीतिक प्रणाली के इतिहास और विकास को बेहतर समझ सकें। इसके विकास के वर्तमान चरण में, यह उपरोक्त विस्तृत दस्तावेज, वस्तुएं आदि प्राप्त करने, जो सामग्री इसके पास उपलब्ध है उसका समुचित परिरक्षण करने और चयनित सामग्री को प्रदर्शनार्थ रखने की ओर ध्यान दे रहा है। यथासमय, इसका विचार संसदीय संस्थाओं के विषय में जानकारी का प्रसार करने के उद्देश्य से और संसद के विकास में, इनके क्रियाकलापों में और इसकी उपलब्धियों में रुचि पैदा करके संसद की समुचित छवि बनाने और इसके प्रति सम्मान को बढ़ावा देने के लिए अन्य कार्य करने का है |


राष्ट्रीय उपलब्धियों का केंद्र (हाल आफ नेशनल एचीवमेंट्स) 


लोक सभा की सामान्य प्रयोजन समिति ने पहली अगस्त, 1984 को राष्ट्रीय उपलब्धियों का केंद्र (हाल आफ नेशनल एचीवमेंट्स) स्थापित करने के लिए एक प्रस्ताव का अनुमोदन किया जिसका उद्देश्य विशेष रूप से स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राष्ट्र द्वारा विविध क्षेत्रों में की गई प्रगति की संपूर्ण तस्वीर पेश करना था। प्रदर्शनियों, माडलों, फोटो और अन्य दृश्य सामग्रियों के द्वारा भारत की उपलब्धियों का एक विशाल दृश्य पेश करने का प्रस्ताव था। इस केंद्र का मूल उद्देश्य था कि दिल्ली आने वाले विदेशी संसदीय प्रतिनिधियों के सदस्यों के समक्ष तथा यहां आने वाले प्रतिष्ठित व्यक्तियों, छात्रों, पर्यटकों और अन्य लोगों के समक्ष श्रव्य-दृश्य साधनों के द्वारा देश की पूर्ण एवं प्रभावशाली तस्वीर पेश की जाए। दुर्भाग्यवश कालांतर में इस दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी। 


संसदीय अधिकारियों की भूमिका 


नवीनतम प्रौद्योगिकीय आविष्कारों और सरकारी कार्य के बढ़ते हुए क्षेत्र एवं जटिलताओं के साथ-साथ हमारी संसद के सदनों के सचिवालयों में कार्य करने के लिए अधिक योग्य एवं उपयुक्त प्रशिक्षण प्राप्त व्यावसायिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों की संदेह आवश्यक होते हैं। 


विधानमंडल के लिए पर्याप्त एवं कुशल अधिकारी एवं कर्मचारी विधानमंडल के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के दायित्वों को देखते हुए यह है कि उनमें उच्च कोटि की योग्यता एवं तत्परता हो, कुशलता एवं विशेषज्ञता हो और विविध अनुभव हों और इन सब बातों के साथ साथ मितव्ययता का गुण भी हो । संसद के दोनों सदनों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को चूंकि संसद सदस्यों की सेवा करनी होती है अतः वे उच्च प्रतिभा रखने वाले, पूर्णतया सत्यनिष्ठ, अपेक्षित योग्यताएं रखने वाले और प्रशिक्षण प्राप्त होने चाहिए। उन्हें अपने महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों का निर्वहन करने के लिए पूरी योग्यता, होशियारी और अनुभव से काम लेना होता है। 


संसद के सचिवालयों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों का परम उद्देश्य सदस्यों की सहायता करना है जिससे कि वे विधायकों के रूप में यथासंभव अधिक से अधिक प्रभावी और कुशल ढंग से अपने कृत्यों का निर्वहन कर सकें । एक संसदीय अधिकारी का सबसे बड़ा कर्तव्य यह है कि वह सदन की सेवा और सहायता करे और सभी मामलों में निष्पक्ष एवं न्यायोचित दृष्टिकोण अपनाए। उसे यह निश्चित कर लेना चाहिए कि अध्यक्ष को दी जानेवाली तथ्यात्मक जानकारी पूर्णतया सही हो, और किसी मामले से संबंधित सभी संगत विनिर्णय एवं पूर्वोधारण पीठासीन अधिकारी के समक्ष रखे जाएं ताकि उसे सही निर्णय करने में सुविधा हो । जहां तक सदस्यों को परामर्श देने का प्रश्न है, संसदीय अधिकारियों से यह अपेक्षित नहीं है कि वे अकारण ही कोई परामर्श दें। जब संसदीय अधिकारी से विशेष रूप से कहा जाए कि वह संसदीय कार्य से संबंधित किसी मामले पर परामर्श दे तभी उसे तथ्यात्मक जानकारी सदस्यों को उपलब्ध करनी चाहिए और उस पर अपनी राय नहीं देनी चाहिए। 


संसदीय अधिकारियों को इस बात से कोई सरोकार नहीं होता कि सदस्य की विचारधारा क्या है या किस राजनीतिक दल से संबंध रखता है। सदस्य का दल कोई भी हो, योग्यताएं कुछ भी हों और जीवन में दर्जा कुछ भी हो, संसदीय अधिकारी के लिए प्रत्येक सदस्य लोगों का सम्माननीय प्रतिनिधि है जिसके साथ उसे आदर से और धैर्य से पेश आना है। सदन के सेवक के नाते, संसदीय अधिकारी के लिए यह अनिवार्य है कि वह सभी सदस्यों से समान रूप से पेश आए। यह सदा स्मरण रखते हुए कि सभी सदस्य उससे सम्मान एवं निष्पक्ष सहायता पाने के अधिकारी हैं, उसे प्रत्येक सदस्य की, जो अपने संसदीय कर्तव्यों के सिलसिले में उससे सहायता मांगे, कुशल ढंग से सेवा करनी होती है। 


अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए अधिकारी को अपने कायक्षेत्र में विशेष ज्ञान प्राप्त होना आवश्यक है। उसे संगत नियमों एवं प्रथाओं का पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक है। यह भी आवश्यक है कि वह सभी महत्वपूर्ण मामलों और नाजुक समस्याओं से अवगत रहे ताकि ऐसा न हो कि अकस्मात ही कोई स्थिति आ जाए जिसके लिए वह तैयार न हो, जैसाकि प्रायः होता है। यदि कोई स्थिति या कोई कठिन समस्या अचानक ही सामने आ जाए तो उसे इस योग्य होना चाहिए कि तुरंत और कुशलता से उससे निबट सके। इस प्रकार, काम निबटाने में तत्परता और त्रुटिहीनता संसदीय अधिकारी के कार्यचालन के मुख्य तत्व हैं। 


यह आवश्यक है कि संसदीय अधिकारियों और कर्मचारियों में संसदीय कार्य व्यवहार के सिद्धांतों की जानकारी हो और उनमें खोजी एवं जिज्ञासु भाव पैदा हो जाए। संक्षेप में कुछ मार्गदर्शी सिद्धांत इस प्रकार हैं : 


(1) संसद की संस्था और लोगों के प्रतिनिधियों के प्रति सम्मान 

(2) सदस्यों की सेवा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता, चाहे वे किसी भी दल के हों; 

(3) सदस्यों और अन्य लोगों के साथ व्यवहार में समर्पण, शिष्टता, आत्म-नियंत्रण, धैर्य, शांत भाव और सहिष्णुता; 

(4) सुस्पष्टता और त्रुटिहीनता और अध्यक्ष के समक्ष पूर्ण तथ्य रखने और निष्पक्ष परामर्श देने की आदत; 

(5) फैसले करने में और काम निबटाने में तत्परता अर्थात काम करने की ऐसी पद्धति जिसमें कोई काम कल पर न छोड़ा जाए; 

(6) सजगता, चेहरे पर मुस्कान और किसी की बात सुनने का धैर्य 

(7) दलगतरहित, निष्पक्ष दृष्टिकोण-एक संसदीय अधिकारी को सभी क्रियाकलापों में भाग लेते हुए भी निर्लेप होना चाहिए; और 

(8) ऐसे समाधान ढूंढ़ने की योग्यता जो केवल सैद्धांतिक रूप से ही सही न हों बल्कि व्यावहारिक भी हों। 


संसद के सचिवालय गतिशील और विकासशील संस्थाएं हैं जिनके लिए अपेक्षित है कि वे सांसदों की बढ़ती हुई एवं परिवर्तनशील आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए निरंतर ध्यान देते रहें। सचिवालयों के अधिकारियों और कर्मचारियों को सदा सतर्क रहना पड़ता है और बराबर सोचते रहना होता है कि सदस्यों तथा संसदीय संस्थाओं की सेवा करने के तरीकों में क्या सुधार लाए जाने चाहिए। संसदीय संस्थाओं की सेवा में सुधार की गुंजाइश सदा रहती है। भारत की संसद उत्तम कार्य निष्पादन के लिए गर्व का अनुभव कर सकती है और इसका श्रेय प्रशिक्षण की प्रक्रियाओं और सुविधाओं को जाता है। वह यह भी आशा रखती है कि आने वाले वर्षों की उपलब्धियां इससे भी बेहतर होंगी। 

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