Wednesday, March 16, 2022

संसद में बजट तथा अन्य वित्तीय प्रक्रिया Budget and other financial procedures in Parliament

कल्याणकारी राज्य के उद्भव के बाद मानव जीवन का ऐसा कोई भी पक्ष नहीं रह गया है जो सरकारों के कार्यक्षेत्र से अथवा उनके दायित्वों की परिधि से बाहर हो। विधि और व्यवस्था बनाए रखने तथा राज्य की विदेशी आक्रमण से रक्षा करने से लेकर लोगों के सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान के लिए योजनाएं कार्यान्वित करने तक सरकारें आज विविध कृत्यों का निर्वहन करती हैं। इसके अतिरिक्त आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और लोगों के लिए रोजगार जैसी अनेक सामाजिक सेवाओं की व्यवस्था सरकार द्वारा की जाती है। यह कहना आवश्यक नहीं है कि सरकारों को इन कृत्यों के निर्वहन के लिए धन की आवश्यकता होती है। यह धन कहां से आए? धन की मंजूरी कौन दे? सरकारी व्यय की पूर्ति के लिए करों, ऋणों आदि के द्वारा देश के संसाधनों में से आवश्यक धन जुटाया जाता है। 


ऐसा नहीं है कि सरकार अपनी इच्छानुसार कर लगा सकती है, ऋण ले सकती है और खर्च कर सकती है। चूंकि राज्य के संसाधन सीमित होते हैं अतः विभिन्न सरकारी कार्यों के लिए दुर्लभ संसाधन नियत करने हेतु उचित बजट व्यवस्था करना आवश्यक हो जाता है। एक निर्धारित अवधि के लिए व्यय की प्रत्येक मद अच्छी तरह सोच-विचार कर रखनी होती है और कुल परिव्यय का हिसाब लगाना होता है। इसके अलावा, इन सब वित्तीय प्रस्तावों के लिए लोगों की मंजूरी का होना आवश्यक है जो उनके चुने हुए प्रतिनिधियों के द्वारा स्पष्ट रूप से व्यक्त की जाती है। 


भारत सरकार का बजट इसी उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष संसद के दोनों सदनों के समक्ष पेश किया जाता है। बजट में सरकार का वित्तीय विवरण दिया जाता है जिसमें एक वित्तीय वर्ष के लिए अनुमानित प्राप्तियां और व्यय दर्शाए जाते हैं। वित्तीय वर्ष इस समय प्रत्येक वर्ष की प्रथम अप्रैल से आरंभ होता है। दूसरे ६ दों में, बजट में इस आशय का प्रस्ताव होता है कि आगामी वर्ष के दौरान किस मद पर कितना खर्च किया जाना है और उसमें कितना धन किस स्रोत से आएगा या कहां से जुटाया जाएगा। बजट के आगामी वर्ष के लिए अनुमान दिए जाते हैं और सरकार को अपनी वितीय और आर्थिक नीतियों तथा कार्यक्रमों का पुनर्विलोकन करने और उनकी व्याख्या करने का अवसर मिलता है। साथ ही, संसद को उन पर विचार करने और आलोचना करने का भी अवसर मिलता है। 


भारत में जिन वित्तीय प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है उनके महत्वपूर्ण तत्व संविधान में निर्धारित हैं जिससे वित्तीय मामलों में लोक सभा की सर्वोच्चता सुनिश्चित होती है। संविधान में उपबंध किया गया है कि संसद के प्राधिकार से ही कोई कर लगाया जाएगा या एकत्रित किया जाएगा अन्यथा नहीं, और राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के संबंध में वार्षिक वित्तीय विवरण दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगा।' इन दो उपबंधों से यह सुनिश्चित हो जाता है कि सरकार एक वर्ष से अधिक अवधि के लिए संसद को नजरअंदाज नहीं कर सकती क्योंकि व्यय के प्रत्येक प्रस्ताव को केवल एक वर्ष के लिए संसद की मंजूरी मिलती है। संविधान में भारत की 'संचित निधि' के लिए उपबंध किया गया है जिसमें ऋणों, अग्रिम राशियों इत्यादि द्वारा प्राप्त सारा राजस्व जमा किया जाता है। बजट में व्यय इस प्रकार सम्मिलित किए जाते हैं : 


(क) व्यय की ऐसी मदों की पूर्ति के लिए अपेक्षित राशियां जिन्हें संविधान में भारत की संचित निधि पर प्रभारित बताया गया है; और 

(ख) अन्य व्यय की पूर्ति के लिए अपेक्षित राशियां जो भारत की संचित निधि से लिए जाने का प्रस्ताव है। 


प्रथम श्रेणी के व्यय के बारे में दोनों सदनों में चर्चा हो सकती है परंतु उसे दोनों में से किसी भी सदन के मतदान के लिए प्रस्तुत नहीं किया जाता। दूसरे शब्दों में, वह बजट का मतदान के लिए न रखा जा सकने वाला भाग है। भारत की संचित निधि पर प्रभारित व्यय में निम्नलिखित सम्मिलित हैं : 


राष्ट्रपति की परिलब्धियां और भत्ते, राज्य सभा के सभापति, उप सभापति और लोक सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन तथा भत्ते, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और अन्य भत्ते और संविधान में या संसद द्वारा विधि बनाकर इस प्रकार प्रभारित घोषित अन्य व्यय भी इसमें शामिल हैं। 


दूसरी श्रेणी का व्यय लोक सभा के समक्ष अनुदानों की मांगों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और इस सभा द्वारा स्वीकृत किया जाता है। लोक सभा की ऐसी मांग को स्वीकृत करने या अस्वीकृत करने या उल्लिखित मांग में कमी करने का अधिकार है। ऐसी कोई मांग राष्ट्रपति की सिफारिश पर ही की जा सकती है, अन्यथा नहीं। इन मांगों का उद्देश्य चूंकि सरकार के कार्यक्रमों और नीतियों को लागू करना होता है इसलिए यदि कोई मांग पूरे तौर पर अस्वीकृत कर दी जाती है तो इसका अर्थ सरकार की पराजय होता है। 


भारत की संचित निधि में से कोई भी धन संसद द्वारा पास किए जाने वाले विनियोग अधिनियम के अधीन ही निकाला जा सकता है, अन्यथा नहीं।' 


वित्तीय विधान की अवस्थाएं 


वित्तीय मामलों के लिए, विशेष रूप से बजट संबंधी कार्य करते समय, संसद में जो प्रक्रिया अपनाई जाती है उसकी तीन अवस्थाएं हैं: 


(क) बजट पेश किया जाना : 


हमारी संसद में बजट दो भागों में पेश किया जाता है, अर्थात रेलवे वित्त के संबंध में रेल बजट' और 'सामान्य बजट' । रेलवे के लिए अलग बजट पेश करने के पीछे मूल विचार यह है कि रेलवे द्वारा निश्चित अंशदान की व्यवस्था होने से सिविल अनुदानों में स्थिरता आए और रेलवे वित्त के प्रशासन में लचीलापन आए। 


रेल बजट रेल मंत्री द्वारा लोक सभा में प्रत्येक वर्ष फरवरी मास के तीसरे सप्ताह में किसी दिन पेश किया जाता है और सामान्य बजट वित्त मंत्री द्वारा फरवरी मास के अंतिम कार्य दिवस को प्रायः 5.00 बजे म.प. पर पेश किया जाता है। किंतु ऐसी कोई बाध्यता नहीं है कि बजट 5.00 बजे ही पेश किया जाए। 2002-2003 का बजट प्रातः 11 बजे पेश किया गया। बजट पेश करते हुए बजट भाषण दिया जाता है जो वास्तव में संसद में सबसे महत्वपूर्ण भाषणों में से एक होता है। यह भाषण दो भागों में होता है : भाग 'क' में देश का सामान्य आर्थिक सर्वेक्षण' होता है और भाग 'ख' में आगामी वित्त वर्ष के लिए 'कराधान प्रस्ताव' होते हैं। लोक सभा में वित्त मंत्री का भाषण समाप्त होने पर, बजट की एक प्रति राज्य सभा के पटल पर रखी जाती है। उसके तुरंत पश्चात मंत्री वित्त विधेयक पेश करता है जिसमें सरकार के कराधान प्रस्ताव होते हैं। उसके बाद सदन स्थगित हो जाता है। जिस दिन बजट पेश किया जाता है उस दिन बजट पर चर्चा नहीं की जाती। 


(ख) बजट पर चर्चा : 


संसद मूलतया विचार विमर्श करने वाला निकाय है। बजट पास करने की प्रक्रिया में संसद के दोनों सदनों में गंभीर एवं पूर्ण चर्चा होती है। बजट पर चर्चा बजट पेश किए जाने के कुछ दिन पश्चात आरंभ होती है। इससे सदस्यों को बजट के पाठ का पूरी तरह अध्ययन करने और वित्तीय प्रस्तावों पर आपस में विचार करने के लिए आवश्यक समय मिल जाता है। बजट पर दो अवस्थाओं में चर्चा की जाती है अर्थात 'सामान्य चर्चा' और उसके बाद विस्तार में 'अनुदानों की मांगों पर चर्चा और मतदान' । इसके अलावा, वित्तीय प्रस्तावों पर अग्रेतर चर्चा का अवसर विनियोग विधेयक और वित्त विधेयक पर विचार किए जाने और इन्हें पास किए जाने के दौरान मिलता है। 


(एक) सामान्य चर्चा : 


बजट पर चर्चा सामान्य वाद-विवाद से आरंभ होती है, जो संसद के दोनों सदनों में तीन या चार दिन तक चलता है। प्रथा यह है कि इस अवस्था में सदस्य सरकार की राजकोषीय और आर्थिक नीतियों के सामान्य पहलुओं पर ही विचार करते हैं और कराधान तथा व्यय के ब्यौरे में नहीं जाते। इस प्रकार सामान्य वाद-विवाद से प्रत्येक सदन को अपने विचार व्यक्त करने का अवसर मिलता है। तब सरकार को भी आभास हो जाता है कि किसी प्रस्ताव विशेष के प्रति बाद की अवस्थाओं में क्या प्रक्रिया होगी। यह ध्यान देने की बात है कि राज्य सभा को दी गई शक्ति के अनुसार उसे सामान्य चर्चा के अलावा बजट से कोई सरोकार नहीं होता। मांगों पर मतदान केवल लोक सभा में होता है।' 


(दो) अनुदानों की मांगों पर चर्चा : 


प्रक्रिया के अनुसार, दूसरी अवस्था अनुदानों की मांगों पर चर्चा और मतदान की है। सामान्यतया, प्रत्येक मंत्रालय के लिए प्रस्तावित अनुदानों के लिए अलग मांगें रखी जाती हैं। इन ‘मांगों' का संबंध बजट के व्यय वाले भाग से होता है और इनका स्वरूप कार्यपालिका द्वारा लोक सभा से किए गए निवेदन का है कि मांगी गई राशि को खर्च करने का अधिकार दिया जाए। मांगें एक प्रस्ताव के रूप में पेश की जानी चाहिए, परंतु व्यवहार में उन्हें पेश हुआ मान लिया जाता है, और सदन का समय बचाने के लिए उनको पीठासीन अधिकारी द्वारा प्रस्तावित किया जाता है। 


मांगों पर चर्चा रुचिपूर्ण होती है और इस चर्चा के दौरान मंत्रालय की नीतियों और कार्यकरण की बारीकी से छानबीन की जाती है। प्रत्येक मंत्रालय की मांगों पर चर्चा के लिए अलग से समय नियत किया जाता है। सदस्य मंत्रालय की नीतियों का निरनुमोदन कर सकते हैं या प्रशासन में मितव्ययता लाने के लिए उपाय सुझा सकते हैं या विशिष्ट स्थानीय शिकायतों की ओर मंत्रालय का ध्यान दिला सकते हैं। अनुदानों की मांगों के मूल प्रस्ताव के सहायक प्रस्ताव पेश करके सदस्य ऐसा कर सकते हैं। इन सहायक प्रस्तावों को संसदीय भाषा में 'कटौती प्रस्ताव' कहा जाता है। कटौती प्रस्ताव तीन प्रकार के होते हैं। सबसे प्रभावी कटौती प्रस्ताव 'नीति निरनुमोदित कटौती' प्रस्ताव होता है जिसमें कहा जाता है “कि मांग की राशि घटा कर एक रुपया कर दी जाए"। इसका निहित अर्थ यह है कि प्रस्तावक मांग की मूल नीति का निरनुमोदन करता । इसके अलावा 'मितव्ययता कटौती' प्रस्ताव होता है जिसका उद्देश्य व्यय में मितव्ययता लाने की दृष्टि से मांग की राशि में उल्लिखित राशि कम करना होता है। यह प्रस्ताव इस रूप में होता है : “कि मांग की राशि में......रुपये की कमी की जाए" (उल्लिखित राशि)। और अंतिम कटौती प्रस्ताव 'सांकेतिक कटौती' प्रस्ताव होता है जिसमें कहा जाता है "कि मांग की राशि में 100 रुपये की कमी की जाए"। इस प्रस्ताव का उद्देश्य, जिसको कटौती प्रस्ताव के रूप में सबसे अधिक प्रयोग किया जाता है, यह है कि ऐसी विशिष्ट शिकायत व्यक्त की जाए जिसके लिए भारत सरकार उत्तरदायी हो। 


सुविधा के लिए, आमतौर पर मूल प्रस्ताव और उससे संबंधित कटौती प्रस्ताव पर सदन में एक साथ चर्चा की जाती है और मतदान के लिए रखा जाता है। इस प्रकार, कटौती प्रस्ताव अनुदानों की मांगों पर चर्चा आरंभ करने का एक उपाय है। चर्चा हो जाने के पश्चात, पहले कटौती प्रस्ताव निबटाए जाते हैं और उसके बाद अनुदानों की मांगें सभा के मतदान के लिए रखी जाती हैं। वास्तव में, कटौती प्रस्ताव प्रतीक मात्र होते हैं क्योंकि जब तक सरकार सदन में बहुमत का समर्थन खो न दे तब तक उनके स्वीकृत होने का प्रश्न नहीं होता। कटौती प्रस्ताव सामान्यतया विपक्ष के सदस्यों द्वारा पेश किए जाते हैं और यदि वे स्वीकृत हो जाएं तो इसका अर्थ होता है सरकार की निंदा। ऐसी स्थिति में, सरकार को यह सोचना पड़ता है कि क्या उसका पद पर बने रहना उचित होगा। 


कार्य मंत्रणा समिति किसी मांग विशेष को और बजट सहित अनुदानों की सब मांगों को स्वीकृत करने के लिए समय सीमा निर्धारित करती है। जैसे ही किसी मांग की समय सीमा समाप्त होती है, उस पर चर्चा के 'समापन' की प्रक्रिया लागू की जाती है और मांग को मतदान के लिए रख दिया जाता है। इसी प्रकार, सभी मांगों के नियत अंतिम दिन को जिन मांगों को तब तक निबटाया न गया हो, उन्हें मतदान के लिए रख दिया जाता है, चाहे उन पर चर्चा हुई हो या न हुई हो। इस प्रक्रिया को 'गिलोटिन' कहते हैं। इसके साथ ही अनुदानों की मांगों पर चर्चा समाप्त हो जाती है। 


विभागों से संबंधित स्थायी समितियों द्वारा छानबीन : 


अनुभव से पता चला कि "गिलोटिन' लागू होने से पहले हर वर्ष केवल चंद एक-कभी कभी तो केवल दो या तीन-मंत्रालयों की अनुदान की मांगों पर सदन में चर्चा हो पाती थी और सरकार के अन्य सभी मंत्रालयों तथा विभागों की अनुदान की मांगों को बिना किसी संसदीय छानबीन या वाद-विवाद के स्वीकृति दे दी जाती थी। विभागों से संबंधित स्थापित की गई संसद की सत्रह स्थायी समितियों को अन्य कार्यों के साथ-साथ संबंधित मंत्रालयों तथा विभागों की अनुदान मांगों पर विचार करने तथा मांगों पर मतदान होने से पहले सदन को रिपोर्ट करने का कार्यभार सौंपा गया है। 1994-95 के बाद से हर वर्ष मांगें संसद के समक्ष पेश किए जाने के बाद, दोनों सदनों को लगभग एक मास के लिए स्थगित कर दिया जाता है ताकि संबंधित स्थायी समितियां उनका निरीक्षण कर सकें तथा उन पर चर्चा कर सकें। बजट अधिवेशन के दौरान यह 17 समितियां अनुदान मांगों का निरीक्षण कर उन पर अपनी रिपोर्ट सदन को प्रस्तुत करती हैं। 


(ग) विनियोग विधेयक (एप्रोप्रिएशन बिल) : 


संविधान के अनुसार, भारत की संचित निधि में से कोई धन, संसद द्वारा विधि के अधिनियम के बिना, नहीं निकाला जा सकता। इस उपबंध के अनुसरण में लोक सभा में एक विधेयक पेश किया जाता है जिसमें लोक सभा द्वारा स्वीकृत अनुदानों की सब मांगों तथा संचित निधि पर प्रभारित व्यय सम्मिलित किया जाता है। इस विधेयक को विनियोग विधेयक कहा जाता है। इस विधेयक का आशय, जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है, संचित निधि में से व्यय के विनियोग के लिए सरकार को कानूनी अधिकार देना है। 


विनियोग विधेयक पर विचार करने और इसे पास करने की पद्धति वही है जो किसी भी अन्य विधेयक के मामले में अपनाई जाती है, सिवाय इसके कि वाद-विवाद उन्हीं मामलों तक सीमित रहता है जिन मांगों पर वाद-विवाद के दौरान चर्चा न की गई हो और इस पर कोई संशोधन पेश नहीं किए जा सकते। विधेयक के लोक सभा द्वारा पास किए जाने के पश्चात अध्यक्ष प्रमाणित करता है कि वह एक धन विधेयक है और उसे राज्य सभा के पास भेजा जाता है। राज्य सभा को विधेयक में संशोधन करने या उसे अस्वीकृत करने की शक्ति प्राप्त नहीं है और उसे विधेयक पर अपनी सम्मति प्रदान करनी ही पड़ती है। इसके पश्चात, विधेयक राष्ट्रपति की अनुमति के लिए उसके समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।" 


(घ) वित्त विधेयक : 


आने वाले वर्ष के लिए सरकार के सब वित्तीय प्रस्ताव एक विधेयक में सम्मिलित किए जाते हैं जिसे वित्त विधेयक कहा जाता है। यह विधेयक साधारणतया प्रत्येक वर्ष बजट पेश किए जाने के तुरंत पश्चात लोक सभा में पेश किया जाता है। यह सरकार के वित्तीय प्रस्तावों को और किसी अवधि के लिए अनुपूरक वित्तीय प्रस्तावों को भी प्रभावी करता है। 


वित्त विधेयक को पेश करने की अनुमति के लिए प्रस्ताव का विरोध नहीं किया जा सकता और उसे तुरंत मतदान के लिए रखा जाता है। विधेयक पर चर्चा सामान्य प्रशासन और स्थानीय शिकायतों संबंधी ऐसे मामलों पर होती है जिनके लिए संघ सरकार उत्तरदायी हो। सरकार की नीति की सामान्य रूप से आलोचना करने की अनुमति तो है परंतु किसी विशेष अनुमान के ब्यौरों पर चर्चा नहीं की जा सकती। संक्षेप में, समूचे प्रशासन का पुनरीक्षण तो होता है परंतु जिन प्रश्नों पर चर्चा हो चुकी हो उन पर फिर से चर्चा नहीं की जा सकती। यह विधेयक पेश किए जाने के पश्चात 75 दिनों के भीतर संसद द्वारा इस पर विचार करके पास किया जाना और उस पर राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हो जाना आवश्यक है। 


लेखानुदान (वोट आन एकाउंट) 


लोकतंत्रात्मक व्यवस्था में सरकार बजट के उपबंधों और कर प्रस्तावों पर चर्चा करने का संसद को पूरा अवसर देने का प्रयास करती है। बजट पास करने की प्रक्रिया बजट पेश किए जाने से लेकर इस पर चर्चा करने और अनुदानों की मांगें स्वीकृत करने और विनियोग तथा वित्त विधेयकों के पास होने तक सामान्यतया चालू वित्तीय वर्ष के आरंभ होने के बाद तक चलती रहती है। जब तक संसद मांगें स्वीकृत नहीं कर लेती तब तक के लिए यह आवश्यक है कि देश का प्रशासन चलाने के लिए सरकार के पास पर्याप्त धन उपलब्ध हो। इसलिए 'लेखानुदान' लिए विशेष उपबंध किया गया है जिसके द्वारा लोक सभा को शक्ति दी गई कि वह बजट की प्रक्रिया पूरी होने तक वित्त वर्ष के एक भाग के लिए पेशगी अनुदान दे सकती है। 


साधारणतया, अनुदानों की विभिन्न मांगों के अंतर्गत समूचे वर्ष के लिए अनुमानित व्यय के 1/6वें भाग के बराबर दो मास के लिए राशि का लेखानुदान लिया जाता है। किसी निर्वाचन वर्ष के दौरान यदि ऐसी प्रत्याशा हो कि सदन द्वारा मुख्य मांगों को और विनियोग विधेयक को पास किए जाने में दो मास से अधिक समय लगेगा तो लेखानुदान तंबी अवधि के लिए, अर्थात तीन या चार मास के लिए. लिया जा सकता है। प्रथा के अनुसार, लेखानुदान को एक औपचारिकता माना जाता है और लोक सभा बिना चर्चा के इसे पास कर देती है। लेखानुदान तब पास होता है जब बजट पर सामान्य चर्चा हो चुकी हो और अनुदानों की मांगों पर चर्चा अभी आरंभ होनी हो। रेल बजट के मामले में जो 31 मार्च से पहले पास कर दिया जाता है, लेखानुदान नहीं लिया जाता लेकिन यदि आवश्यक हो तो निर्वाचन वर्ष में लिया जा सकता है। 


अनुपूरक तथा अतिरिक्त अनुदानों की मांगें" 


संसद द्वारा प्राधिकृत राशियों से अधिक राशि उसकी मंजूरी के बिना खर्च नहीं की जा सकती। यदि किसी विशिष्ट सेवा के लिए मंजूर की गई राशि उस वर्ष के प्रयोजनों के लिए अपर्याप्त पाई जाए या किसी 'नई सेवा' पर जिसकी उस वर्ष के बजट में परिकल्पना न की गई हो, अनुपूरक या अतिरिक्त व्यय की आवश्यकता उत्पन्न हो जाए तो राष्ट्रपति उस व्यय की अनुमानित राशि दर्शाने वाला एक अन्य विवरण, अर्थात अनुपूरक अनुदानों की मांगें दर्शाने वाला विवरण, संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाता है। 


यदि किसी वित्तीय वर्ष के दौरान किसी सेवा पर उस वर्ष के लिए दी गई राशि से अधिक राशि खर्च हो गई हो तो राष्ट्रपति ऐसी अतिरिक्त राशि के लिए मांग लोक सभा में पेश करवाता है। ऐसे अतिरिक्त व्यय के सभी मामले नियंत्रक महालेखापरीक्षक द्वारा विनियोग लेखाओं पर अपने प्रतिवेदन के माध्यम से संसद की जानकारी में लाए जाते हैं। तब अतिरिक्त व्यय के मामलों की जांच लोक लेखा समिति द्वारा की जाती है जो सदन के समक्ष पेश किए जाने वाले अपने प्रतिवेदन में उस व्यय को नियमित करने के बारे में सिफारिशें करती है। 


अनुपूरक अनुदानों की मांगें वित्तीय वर्ष की समाप्ति से पूर्व सदन में पेश की जाती हैं और पास की जाती हैं जबकि अतिरिक्त अनुदानों की मांगें वास्तव में राशिया खर्च कर चुकने के बाद और उस वित्तीय वर्ष के बीत जाने के बाद पेश की जाती हैं, जिससे वे संबंधित हों। 


अनुपूरक अनुदानों को मांगों पर चर्चा प्रस्तुत मांगों तक ही सीमित रहती हैं और मूल अनुदानों पर या उनकी अंतर्निहित नीति पर चर्चा नहीं की जा सकती। मुख्य बजट में जिन योजनाओं को मंजूरी मिल चुकी हो उनके विषय में किसी सिद्धांत मा संबंध है जिनके लिए मंजूरी न ली गई हो उनकी अंतर्निहित नीति के प्रश्न पर चर्चा व्यय की उन मदों तक सीमित रखनी होती है जिनकी सदन से स्वीकृति ली जा रही है। अनुपूरक अनुदान पर चर्चा के दौरान सामान्य शिकायतें व्यक्त नहीं की जा सकतीं। सदस्य केवल यह कह सकते हैं कि अनुपूरक मांग आवश्यक है या नहीं। 


अतिरिक्त अनुदानों की मांगों पर चर्चा के दौरान सदस्य यह कह सकते हैं कि धन किस प्रकार अनावश्यक रूप में खर्च किया गया है या कि उसे खर्च नहीं करना चाहिए था। इस अवस्था में चर्चा यहीं तक सीमित रहती है और सामान्य चर्चा की या शिकायतें व्यक्त करने की कोई गुंजाइश नहीं होती। 


प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान" (वोट आफ क्रेडिट और एक्सैप्शनल ग्रांट) 


किसी राष्ट्रीय आपात के कारण सरकार को धन की अप्रत्याशित मांग को पूरा करने के लिए निधियों की आवश्यकता हो सकती है जिसके विस्तृत अनुमान देना शायद संभव न हो । ऐसी स्थिति में सदन बिना ब्यौरे दिए प्रत्ययानुदान के माध्यम से एकमुश्त धनराशि दे सकता है। 


अपवादानुदान किसी विशेष प्रयोजन के लिए दिया जाता है जो वित्तीय वर्ष के साधारण खर्च का भाग नहीं होता। ऐसी स्थिति में सदन उस विशेष प्रयोजन के लिए अलग धनराशि दे सकता है। तथापि, अब तक ऐसी कोई मांगें संसद में पेश नहीं की गई हैं। 


इनके अतिरिक्त, राष्ट्रपति के शासनाधीन संघ-राज्य क्षेत्रों और राज्यों के बजट भी लोक सभा में पेश किए जाते हैं। ऐसे मामलों में संघ सरकार के बजट संबंधी प्रक्रिया का ऐसे परिवर्तनों या रूपभेदों के साथ पालन किया जाता है जो अध्यक्ष करे। 

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