Thursday, March 24, 2022

पंडित मदन मोहन मालवीय की जीवनी Biography of Pandit Madan Mohan Malviy

महामना मालवीय का पूरा नाम पंडित मदनमोहन मालवीय था। आपका जन्म सन् 1861 ई० में दिसम्बर मास की 25वी० तारीख को इलाहाबाद में हुआ था। आपके पूर्वज मालवा के निवासी थे। यही कारण है कि मालवा के निवासी होने से आप लोगों की पदवी मालवीय पड़ गई है। मालवीयजी के पूज्य पितामह का नाम श्री प्रेमधर मालवीय था। आपके पूर्वज सदा से संस्कृत के प्रगाढ़ विद्वान् होते आये हैं। मालवीयजी के पिता पं० ब्रजलाल मालवीय जी भी साधारण स्थिति के एक प्रौढ़ संस्कृत विद्वान् थे और कथा वाचन से ही अपनी जीविका निर्वाह करते थे। मालवीयजी के पूज्य पिता ने भक्ति के ऊपर एक सुन्दर पुस्तक भी संस्कृत में लिखी है जिसका नाम 'सिद्धान्त दर्पण' है। 

पंडित मदन मोहन मालवीय की जीवनी Biography of Pandit Madan Mohan Malviy



मालवीयजी की प्राथमिक शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई। कुछ बड़े होने पर आप प्रयाग की सनातन धर्म पाठशाला में पढ़ने के लिये बैठाये गये। थोड़ी सी संस्कृत पढ़ने के पश्चात् आपकी इच्छा अँगरेजी पढ़ने की हुई और आपने वहाँ के गवर्नमेन्ट हाईस्कूल में नाम लिखा लिया। सन् 1879 में आपने यहाँ से एन्ट्रेन्स की परीक्षा पास की और शीघ्र ही वहाँ के म्योर सेन्ट्रल कालेज में पढ़ने लगे। प्रारम्भ ही से आप पढ़ने-लिखने में बड़े अच्छे थे और सार्वजनिक कार्यों में बड़ा भाग लेते थे। चलतापुर्जा स्वभाव आपका लड़कपन ही से था। उस समय भी आप छोटे-छोटे वाद-विवादों में अच्छा बोल लेते थे। बड़े होने पर आपके ये ही सब गुण पूर्ण रूप से प्रस्फुटित हुए और आपको महापुरुष के उच्च सिंहासन पर बिठलाया। मालवीयजी ने सन् 1884 में बी०ए० की डिग्री ली । 


अर्थाभाव से अब अधिक पढ़ना उचित न समझ आपने प्रयाग के गवर्नमेन्ट हाईस्कूल में टीचरी कर ली और अध्यापन का काम सुचारु रूप से करने लगे। यहाँ पर आपने सन् 1884 ई० से लेकर सन् 1887 तक अर्थात् तीन वर्ष तक नौकरी की। आपका अध्यापन काल बड़ा महत्त्वपूर्ण रहा। विद्यार्थी पूर्ण रूप से आपसे संतुष्ट रहते थे। सन् 1887 ई० के मध्य में कालाँकाकर के सुप्रसिद्ध राजा सर रामपालसिंह ने मालवीयजी को 'हिन्दुस्तान' नामक दैनिक पत्र के सम्पादन के लिये निमन्त्रण दिया। मालवीयजी ने यह कार्य स्वीकार कर लिया और आप उस पत्र का सम्पादन करने लगे। इस समय आपकी आय दो सौ रुपये मासिक थी। आप 'हिन्दुस्तान' का सम्पादन सुचारु रूप से करने लगे और कुछ ही दिनों में यह पत्र चल निकला। इसकी ग्राहक संख्या बहुत बढ़ गई और यह पत्र प्रसिद्ध हो चला। 


प्रयाग के कुछ प्रसिद्ध लोगों ने, जिनमें पं० अयोध्यानाथ का नाम प्रमुख है, मालवीयजी के गुणों को परखा और उन लोगों ने देखा कि यह एक भावी महापुरुष हैं। अतएव उन्होंने मालवीयजी को संपादन कार्य छोड़कर कानून पढ़ने की सलाह दी। मालवीयजी ने अपने शुभचिन्तकों की राय उचित समझी और आपने 'हिन्दुस्तान' का सम्पादन छोड़ दिया। आपने सन् 1891 में कानून की परीक्षा दी और एलएल०बी० की डिग्री प्राप्त की। मालवीयजी ने अब अपनी वकालत 1893 ई० से करनी आरम्भ की। थोड़े ही काल में आपकी वकालत चल निकली। सार्वजनिक कार्य अधिक करने के कारण आप अधिक दिनों तक वकालत न कर सके और शीघ्र ही देश-सेवा करने के लिये आपने वकालत को लात मार दी। 


आपका महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक जीवन सन् 1886 ई० से प्रारम्भ होता है। इसी वर्ष आप अपने श्रद्धेय गुरु पं० आदित्यराम भट्टाचार्य के साथ कलकत्ते की कांग्रेस में प्रयाग से सदस्य होकर गये। इसी कांग्रेस में आपने अपना पहिला सार्वजनिक भाषण दिया था जिसे लोगों ने बड़ा पसन्द किया। उस समय आपकी अवस्था केवल 25 वर्ष की थी। आपका भाषण अत्यन्त मधुर तथा धाराप्रवाह हुआ था। सब लोग उसे सुनकर मन्त्रमुग्ध से हो गये थे। 


प्रयाग विश्वविद्यालय के लड़कों के रहने के लिये छात्रावास न रहने के कारण उन्हें बड़ा कष्ट होता था। अतएव आपने धनी लोगों से चन्दा इकट्ठा किया और वहाँ पर एक छात्रावास बनवा दिया जिसका नाम आपने 'मेकडानल हिन्दू छात्रावास' रखा। 


सन् 1905 ई० में कांग्रेस का अधिवेशन बनारस में हुआ, जिसके सभापति माननीय गोखलेजी थे। इस कांग्रेस में देश के सब बड़े-बड़े नेता, लाला लाजपत राय तथा लोकमान्य तिलकजी आदि भी पधारे थे। इसी समय हिन्दू विश्वविद्यालय बनाने की स्कीम तैयार की गई। 


कांग्रेस कार्य 


महामना मालवीय कांग्रेस के बहुत पुराने सेवक हैं। आपका राजनैतिक जीवन कांग्रेस के जन्म के साथ ही आरम्भ होता है। महात्माजी के शब्दों में आप ‘राष्ट्र के सबसे पुराने सेवक' हैं। सन् 1886 ई० में अर्थात् कांग्रेस के जन्म के दूसरे वर्ष आप कलकत्ते की कांग्रेस में प्रयाग से सदस्य बन कर गये थे। आपने वहाँ अपना राजनैतिक क्षेत्र में सर्वप्रथम भाषण कांग्रेस प्लेटफार्म से दिया। तब से महामना कांग्रेस के प्रत्येक अधिवेशन में अविच्छिन्न रूप से जाते रहे। छोटी ही अवस्था में ही आपका कांग्रेस में रंग जम गया। प्रत्येक अधिवेशन में आप किसी महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव का समर्थन तथा अनुमोदन करते थे। आप कांग्रेस के उस समय से मेम्बर थे जब कि इस महती संस्था का मेम्बर होना सरकार की आँखों का काँटा बनना था। आप लन्दन से निकलने वाले 'इन्डिया' नामक पत्र के संरक्षक भी थे। राष्ट्र ने महामना की इन सब ठोस सेवाओं को देखकर सन् 1909 ई० में लाहौर कांग्रेस का सभापति बनाया। उस महान् पद से दिया गया आपका भाषण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था। आपने मिन्टो-मार्ले सुधार की कड़ी आलोचना की। आप देश में घूम कर कांग्रेस के सिद्धान्तों का सर्वदा प्रचार करते रहे और जागृति पैदा करते रहे। सन् 1918 ई० में पुनः राष्ट्र ने आपको कांग्रेस का सभापति बनाया। सन् 1919 ई० में पंजाब के हत्याकाण्ड के अवसर पर आपने दुःखितों की बड़ी सेवा की। पीड़ितों को अन्न-जल दिया। सन् 1920 ई० के असहयोग आन्दोलन से महामना सहमत नहीं थे। आन्दोलन की गति धीमी पड़ने पर आप एसेम्बली में राष्ट्रीय दल के नेता रहे। सन् 1929 ई० में सविनय अवज्ञा आन्दोलन में आपको छः मास का कारावास मिला और आपने 70 वर्ष की इस बूढ़ी अवस्था में भी उस दुःख को सहा। सन् 1932 में दिल्ली कांग्रेस के आप सभापति मनोनीत किये गये परन्तु गिरफ्तार कर लिये गये। सन् 1933 में कलकत्ता की कांग्रेस के भी आप सभापति चुने गर थे। आपने देश की बड़ी सेवा की। 


हिन्दू विश्वविद्यालय


काशी की पवित्र नगरी में एक विश्वविद्यालय की जिसमें प्राच्य विद्या के साथ-साथ विज्ञान, राजनीति आदि विषय भी पढ़ाया जाय की आवश्यकता महामना को बहुत दिनों से मालूम हो रही थी। अतः 1905 ई० से आपने इसके लिये धन एकत्रित करना प्रारम्भ किया। 1916 ई० में लार्ड हार्डिज ने विश्वविद्यालय का शिलान्यास किया। उस समय भारत के बड़े-बड़े राजा, महाराजा, विद्वान् और महापुरुष उपस्थित थे। 1918 ई० से अध्ययन कार्य नियमित रूप से प्रारम्भ हो गया। विश्वविद्यालय में अनेक कालेज हैं जिनमें आर्ट्स कालेज, इंजीनियरिंग कालेज, लॉ कालेज, ओरिएन्टल कालेज, आयुर्वेदिक कालेज तथा कृषि कालेज प्रसिद्ध हैं। आजकल इस संस्था में कई हजार अध्यापक अध्यापन कार्य कर रहे हैं तथा लाखों विद्यार्थी विद्यारूपी अमृत का नित्यशः पान करते हैं। 


कौन्सिल-कार्य 


महामना का कौन्सिल-जीवन बहुत ही महत्त्वपूर्ण था। आपने वहाँ जनता के लिये अनेकों लाभदायक कानूनों का निर्माण कराया और देश हित में विरोधी कानूनों का जी जान से विरोध किया। आप बहुत दिन तक यू० पी० कौन्सिल के मेम्बर रहे। यहाँ आप सरकार के बजट का निर्भीकता पूर्वक खण्डन-मण्डन करते थे। सन् 1910 ई० में आप बड़ी कौन्सिल के मेम्बर नियुक्त हुये। सन् 1910 ई० में जो प्रेस एक्ट पास हुआ इसका महामना ने बड़े जोरों से विरोध किया। सन् 1918 में जब बड़ी कौन्सिल में रौलेट बिल पेश हुआ था उस समय भी आपकी सरकार से गहरी मुठभेड़ हुई थी। आपने इस बिल को नाशकारी सिद्ध किया। उसी साल अमृतसर में मार्शल ला जारी हुआ। महती नरहत्या हुई। अतः सरकार ने एन्डेम्निटी (अफसर मोक्षदायिनी) बिल पेश किया। महामना ने इस अन्यायपूर्ण बिल का जी जाने से विरोध किया तथा आपने पूरी पाँच घंटे की वक्तृता में सरकारी अफसरों के अत्याचारों का रोमांचकारी वर्णन किया। परन्तु ‘नक्कार खाने में तूती की आवाज'! सन् 1930 ई० में 'इम्पीरियल प्रिफेरेन्स' का भी आपने घनघोर विरोध किया था और उसके पास हो जाने पर आपने उसी समय अपनी पार्टी के साथ त्याग-पत्र दे दिया। 


वक्तृता 


महामना की लोकोत्तर वाग्मिता सब पर विदित है। आपका वाक्यविन्यास इतना सरल होता है और वह ऐसी दुत अथ च संयत गति से आगे बढ़ता है कि किसी स्थान पर न तो रस-भंग ही होता है और न उसके पारस्परिक भाव में अन्तर पड़ता है। आपकी वक्तृता सुनते समय माननीय गोखले की स्मृति होती है। गोखले की वक्तृता में गम्भीरता और भाव-प्रकाशन पटुता अधिक मात्रा में होती थी। महामना की वक्तृता सरस और मधुर होती थी। कारण यह है कि आप भावुक और रसज्ञ थे। आपकी वक्तृता में छन्द, गति और मर्मस्पर्शी ओज था, उसमें मनोरंजनकारी कल्पना भी मिलती थी। आपके भाषण में शब्दाडम्बर का नाम नहीं। घंटों तक भाषण करना आपके बायें हाथ का खेल था। जालियानवाला बाग वाली दुर्घटना के सम्बन्ध में आपने लगातार पाँच घन्टे तक एसेम्बली में भाषण किया था। 


गुण-गरिमा 


आप पक्के आस्तिक तथा धर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे। आप परम निष्ठावान्, आचारवान्, शास्त्र-विश्वासी तथा एक अलौकिक ब्राह्मण थे। शुद्ध तथा सदाचार ही महामना के जीवन का मूलमन्त्र था। सर्वाङ्गीण शुचिता ही आपका प्राण थी। 


आपके जीवन में राष्ट्रीयता का विशेष स्थान रहा। राष्ट्र के पूर्ण विकास का ध्येय, आपका जीवन ध्येय था। समस्त देश-वासियों के आप परम निधि थे। उस पुनीत ध्येय की प्राप्ति के लिये, आप वयोवृद्ध अवस्था में भी, अपने अदम्य उत्साह के बल पर परिश्रम करते रहे। राष्ट्र की बलि-वेदी पर आपने कौन-कौन से त्याग नहीं किये? आपने सदा. विघ्न सहे, संकट झेले परन्तु एक क्षण के लिये भी विचलित नहीं हुए। प्रिय स्वदेश की स्वतन्त्रता के लिये आपका अपूर्व त्याग भारत के भविष्य इतिहास की अमूल्य सामग्री होगी। इसी त्याग पर मुग्ध होकर कारागार की प्राचीरों ने भी आपको आमन्त्रित करके अपना अभ्यागत बनाया था। 


देश के दीन, दरिद्र और असहायों के करुण-क्रन्दन ने आपकी सहानुभूति का आश्रय पाया। उनकी दुःख निवृत्ति के लिये आपने सम्पूर्ण सुख और वैभव का तिरस्कार करके देश-सेवा की शुभ दीक्षा ली और अपने जीवन को स्वदेश सेवा में अर्पण कर दिया। 


धर्म को आपके इस शुभ्रवस्त्रावृत देह से इतना स्नेह है कि राजनीति के क्षेत्र में अवतीर्ण होने पर भी वह आपकी संगति न त्याग सका। आपमें धर्म और राजनीति के ऐसे सुन्दर संयोग ने विश्व को चकित कर दिया। आपकी इस प्रत्यक्ष धर्ममूर्ति ने राजा, रंक, धनी और पण्डित सबके हृदय में समान स्थान प्राप्त कर लिया। आपकी यह धवल सौम्यमूर्ति भारतीय सभ्यता और संस्कृति का एकान्त भण्डार है। 


आत्मार्थ जीवलोकेऽस्मिन् को न जीवति मानवः। 

परं परोपकाराय यो जीवति स जीवति॥ 

No comments:

Post a Comment